कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी का तोड़ निकालने के लिए वैज्ञानिक तेजी से प्रयास कर रहे हैं। इसी दिशा में भारत और ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक एंटीबॉडी तैयार की है और उससे कैंसर के उपचार में सफलता हासिल करने का दावा किया है। उनका कहना है कि इस एंटीबॉडी के इस्तेमाल से शरीर में एक मेडिकल स्मार्ट बम बनाया जा सकता है जो कैंसर की कोशिकाओं को नष्ट कर सकता है। वर्तमान में उपलब्ध कैंसर के इलाज ट्यूमर की कोशिकाओं को तो नष्ट कर देते हैं, लेकिन वो कैंसर की नई स्टेम सेल को नहीं मार पाते। मगर यह एंटीबॉडी ऐसा कर पाने में सक्षम है। ऑस्ट्रेलिया के डीकिन विश्वविद्यालय और बेंगलूर के भारतीय विज्ञान संस्थान ने बारवन हेल्थ्स एंड्रयू लव कैंसर सेंटर और कैम जेनेक्स फार्मास्यूटिकल्स के साथ मिलकर इस अंतरराष्ट्रीय परियोजना पर काम किया है। वैज्ञानिकों की टीम ने आरएनए एप्टामर प्रोटीन की एक विशेष रसायनिक एंटीबॉडी तैयार की है, जो कैंसर की कोशिकाओं के खिलाफ गाइडेड मिसाइल की तरह काम करती है। यह अध्ययन कैंसर साइंस जर्नल में प्रकाशित हुई है। इस एंटीबॉडी में दवा को ले जाकर सीधे कैंसर कोशिकाओं पर हमला करने की क्षमता होती है। इसके अलावा यह कैंसर से प्रभावित भाग को पहचानने में भी काफी उपयोगी है। डीकिन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डूआन ने कहा, तमाम नई तकनीक और चिकित्सकीय सुविधाएं आने के बावजूद कैंसर से मरने वालों की संख्या में कमी नहीं आ रही है। इसकी वजह कैंसर की सही समय से पहचान व इलाज नहीं हो पाना है। क्या है एंटीबॉडी? एंटीबॉडी रक्त में पाया जाने वाला एक प्रकार का प्रोटीन है। जो मेरूंदडीय प्राणियों के रक्त या अन्य शारीरिक तरल पदार्थो में पाए जाते हैं। इनका प्रयोग प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा बैक्टीरिया और वायरस (विषाणु) जैसे बाह्य पदार्थो को पहचानने तथा उन्हें बेअसर करने के लिए किया जाता है।
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Saturday, February 19, 2011
औरतों से अधिक बातूनी हैं मर्द
यह जानकर बहुत लोग चौंक जाएंगे लेकिन सच यही है। औरतों के मुकाबले मर्द कहीं अधिक बातूनी होते हैं। एक ताजा अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है। गप्पे मारने और वक्त-बेवक्त अधिक बात पुरुष और महिलाओं में से कौन अधिक करता है, तो अब हकीकत यही है कि मर्द ज्यादा बात करते हैं। औरतें अब तक बेवजह इस मामले में बदनाम रही हैं। युवक हों या वृद्ध वह बातों में महिलाओं से आगे हैं। लेकिन वह बहुत रोचक बातें करना नहीं जानते। मतलब बात करने की अवधि अधिक जरूर है लेकिन उनकी बातों में वह रस नहीं है जो महिलाओं की बातचीत में होता है। किसी जिरह को जीतना, चुटीली और खट्टी-मीठी बातों में अभी भी महिलाएं ही बाजी मारती हैं। अध्ययन में पाया गया है कि पुरुषों की बातचीत में शब्द अधिक होते हैं लेकिन महिलाओं के मुकाबले अपनी बात कहने का अंदाज वह बेहतरीन नहीं बना पाते। उनकी बातों के भाव उतने सटीक तरीके से प्रकट नहीं होते जितना महिलाएं कर पाती हैं। रीसर्च में यह भी पाया गया है कि जब गंभीर मुद्दों पर बातचीत हो रही हो तो पुरुष और महिलाओं की सोच-समझ का दायरा बराबर का होता है और शब्द भी एक समान ही इस्तेमाल किए जाते हैं। खासकर करंट अफेयर्स में दोनों में ही यह क्षमता समान रूप से है। अध्ययन में एक और मजेदार बात सामने आई है कि जब पुरुष अपने मित्रों के बीच हों तो उनकी बातचीत में शब्दों की भरमार होती है। पर फिर भी वह अपने आप को बहुत अच्छी तरह से जाहिर नहीं कर पाते। दूसरी ओर मित्रों के बीच महिलाएं भी अपने आप को ठीक से जाहिर नहीं कर पातीं। पर इसकी वजह यह है कि उनकी शब्दावली सीमित होती है। इस अध्ययन से एक मिथ और टूटा है कि महिलाओं की तरह पुरुष भी तारीफ किए जाने पर झेंप जाते हैं और जवाब देने में उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ती है। इस अध्ययन ने महिलाओं के माथे से बातूनी होने का ठप्पा हटाया दिया है और अब यह मुहर पुरुषों पर लग गई है। चूंकि पुरुष ही ज्यादातर बस बात करने के लिए ही बात करते हैं। डेली एक्सप्रेस ने मेनचेस्टर यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग के प्रमुख प्रोफेसर जेफरी बीटल के हवाले से यह रिपोर्ट प्रकाशित की है।
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