विज्ञान संबंधी शोध के क्षेत्र में अग्रणी होने के बावजूद भारत अंतरराष्ट्रीय मान्यता या श्रेय पाने में पिछड़ क्यों जाता है। यह विचारणीय मुद्दा है। पिछले वर्ष टेस्ट ट्यूब बेबी की सफलता में मेडिसिन का नोबल पुरस्कार 32 वर्ष बाद डॉ. राबर्ट जी एडर्वड और पेट्रिक स्टेपटो को दिया गया। जुलाई 1978 में इनके प्रयासों से आईवीएफ लुईस दुनिया में आई थी। भारतीय डॉक्टर सुभाष मुखोपाध्याय ने लुईस के जन्म के तीन महीने बाद ही दुनिया की दूसरी टेस्ट ट्यूब बेबी दुर्गा को जन्म दिलवाया पर दुर्भाग्य से उनके कार्य की प्रशंसा के बजाय तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा उनके अनुसंधान को प्रकाशित होने से न सिर्फ रोका गया बल्कि तंग होकर 1981 में वह आत्महत्या करने पर मजबूर हो गये। आखिर में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने 2005 में उनके काम को मान्यता दी। पर यह सब इतनी देर से हुआ कि डॉ. मुखोपाध्याय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के सम्मान को भी ठेस लगी। इसी तरह मार्कोनी को टेलीग्राफ की खोज के लिए दुनिया ने सराहा, जबकि कहा जाता है कि जगदीशचंद्र बसु इस पर पहले ही अनुसंधान कर चुके थे। माना कि गुलामी के दौर में भारतीयों के शोधों को अंग्रेज महत्व नहीं देते थे लेकिन दुर्भाग्य से आजादी के बाद भी अनेक वैज्ञानिक उपलब्धियों को वरीयता नहीं दी जाती। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कई कनिष्ठ वैज्ञानिकों की आत्महत्या की खबरें जब-तब आती रही हैं। आरोप लगते रहे हैं कि उनकी उपलब्धि का श्रेय उनके वरिष्ठ स्वयं लेने की कोशिश करते हैं। हमारे शोध संस्थानों में ऐसी स्थितियां अब भी बनी हुई हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में नये-नये अनुसंधान होने चाहिए लेकिन अव्यवस्था और नौकरशाही के दबाव में यह संस्थान कुछ भी करने में अपने को उतना सक्षम नहीं पा रहा है। कुछ वर्षों पहले एक विश्वसनीय सूत्र ने बताया था कि संस्थान में अत्याधुनिक मशीनें चलाने वाले ही नहीं थे। ऐसे अनेक चिकित्सक जो अब संस्थान छोड़ चुके हैं और निजी चिकित्सा संस्थानों में अपनी सेवायें देने के साथ सफल शोध कर रहे हैं इसका खुलासा करते हैं। इनमें एक डॉ. जीसी तलवार जो नेशनल इंस्टीट्यूट आफ इम्यूनोलॉजी के संस्थापक हैं का दावा है कि विगत में उन्होंने दो टीकों की खोज की थी पर उनके विभागाध्यक्ष ने उस शोध को रोकने की पूरी कोशिश की। डा. तलवार याद करते हैं कि 1956 में जब एआईआईएमएस खुला था तो उनकी नियुक्ति ऐसोसिएट प्रोफेसर के रूप में हुई थी। बाद में जब प्रोफेसर के पद सृजित हुए तो डॉ. तलवार सहित संस्थान के 22 लोगों को कोई वरीयता नहीं दी गई और बाहरी लोगों को नियुक्त किया गया। वह मानते हैं जब तक किसी संस्थान में कोई गाड फादर न हो, तब तक शोधार्थी सही ढंग से शोध नहीं कर सकता। 1970 में जब वह कुष्ठ रोग के टीके का क्लिनिकल ट्रायल कर रहे थे तब भी उन्हें भारी अवरोधों का सामना करना पड़ा था और इससे वह कार्य तीन वर्ष पीछे हो गया। डॉ. तलवार ने जनसंख्या नियंतण्रके टीके का ईजाद किया तो उस पर भी विवाद हुआ। कहा गया कि एंटी एचसीजी टीका महिलाओं को बांझ बना देता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जब डॉ. तलवार के शोधपत्र पर जनसंख्या परिषद के निदेशक डॉ शेल्डन का ध्यान गया तो भारत सरकार के तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. कर्ण सिंह को इसकी जानकारी दी गई। बाधाओं के बावजूद 1980 में इस टीके का पेटेंटीकरण हुआ। तलवार को कनाडा और राकफेलर संस्थान से आर्थिक सहायता मिली। यह भी आरोप है कि अक्सर शोध पर वरिष्ठ सदस्य अपना नाम पहले रखवाने का दबाव डालते हैं। जबकि शोध पत्र कनिष्ठ सहयोगी द्वारा तैयार किया गया होता है। जबकि विदेशों के मेडिकल जनरल में शोध पत्र तैयार करने वाले का नाम पहले और निरीक्षक का बाद में छपता है। भारत में यह प्रक्रिया एकदम उल्टी है। डा. अनूप मिश्रा जो अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के मेडिसिन विभाग में 30 वर्षों तक प्रोफेसर रहे, का भी आरोप है कि उनके कनिष्ठ सहयोगियों को एचआईवी पर शोध करने की अनुमति नहीं दी गई। यहां तक कि रोगी के रजिस्ट्रेशन, उसका नाम, पता और फोन नंबर आदि विभागाध्यक्ष किसी को नहीं बताते। यानी अफसरशाही शोध कायरें में बाधा पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ती। उनका अनुभव है कि अनुसंधान में काम आने वाले छोटे से छोटे उपकरण के लिए कई चैनलों से हो कर गुजरना पड़ता है। जबकि निजी संस्थानों में जैसे ही एथिक्स पैनल शोध पत्र को स्वीकृति देता है, एक महीने के भीतर शोध कार्य शुरू हो जाता है। वैज्ञानिक प्रगति के निमित्त आज हमें इन कमियों को दूर करने की आवश्यकता है, तभी ब्रेन ड्रेन को रोक सकते हैं। जरूरी नहीं कि यह ब्रेन देश से बाहर जाए। क्योंकि आज के समय में उसकी प्रतिभा का उपयोग कोई भी देश कहीं भी बैठ कर अपने हित में कर सकता है। वैज्ञानिकों के लिए शोध का अनुकूल माहौल होना चाहिए। नहीं तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां देश के अनुसंधानों का पेटेंट अपने नाम करवाती जाएंगी। और हमें इनका कोई श्रेय नहीं मिल पाएगा।
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Thursday, February 10, 2011
वैज्ञानिक शोधों के लिए हो अनुकूल माहौल
विज्ञान संबंधी शोध के क्षेत्र में अग्रणी होने के बावजूद भारत अंतरराष्ट्रीय मान्यता या श्रेय पाने में पिछड़ क्यों जाता है। यह विचारणीय मुद्दा है। पिछले वर्ष टेस्ट ट्यूब बेबी की सफलता में मेडिसिन का नोबल पुरस्कार 32 वर्ष बाद डॉ. राबर्ट जी एडर्वड और पेट्रिक स्टेपटो को दिया गया। जुलाई 1978 में इनके प्रयासों से आईवीएफ लुईस दुनिया में आई थी। भारतीय डॉक्टर सुभाष मुखोपाध्याय ने लुईस के जन्म के तीन महीने बाद ही दुनिया की दूसरी टेस्ट ट्यूब बेबी दुर्गा को जन्म दिलवाया पर दुर्भाग्य से उनके कार्य की प्रशंसा के बजाय तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा उनके अनुसंधान को प्रकाशित होने से न सिर्फ रोका गया बल्कि तंग होकर 1981 में वह आत्महत्या करने पर मजबूर हो गये। आखिर में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने 2005 में उनके काम को मान्यता दी। पर यह सब इतनी देर से हुआ कि डॉ. मुखोपाध्याय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के सम्मान को भी ठेस लगी। इसी तरह मार्कोनी को टेलीग्राफ की खोज के लिए दुनिया ने सराहा, जबकि कहा जाता है कि जगदीशचंद्र बसु इस पर पहले ही अनुसंधान कर चुके थे। माना कि गुलामी के दौर में भारतीयों के शोधों को अंग्रेज महत्व नहीं देते थे लेकिन दुर्भाग्य से आजादी के बाद भी अनेक वैज्ञानिक उपलब्धियों को वरीयता नहीं दी जाती। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कई कनिष्ठ वैज्ञानिकों की आत्महत्या की खबरें जब-तब आती रही हैं। आरोप लगते रहे हैं कि उनकी उपलब्धि का श्रेय उनके वरिष्ठ स्वयं लेने की कोशिश करते हैं। हमारे शोध संस्थानों में ऐसी स्थितियां अब भी बनी हुई हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में नये-नये अनुसंधान होने चाहिए लेकिन अव्यवस्था और नौकरशाही के दबाव में यह संस्थान कुछ भी करने में अपने को उतना सक्षम नहीं पा रहा है। कुछ वर्षों पहले एक विश्वसनीय सूत्र ने बताया था कि संस्थान में अत्याधुनिक मशीनें चलाने वाले ही नहीं थे। ऐसे अनेक चिकित्सक जो अब संस्थान छोड़ चुके हैं और निजी चिकित्सा संस्थानों में अपनी सेवायें देने के साथ सफल शोध कर रहे हैं इसका खुलासा करते हैं। इनमें एक डॉ. जीसी तलवार जो नेशनल इंस्टीट्यूट आफ इम्यूनोलॉजी के संस्थापक हैं का दावा है कि विगत में उन्होंने दो टीकों की खोज की थी पर उनके विभागाध्यक्ष ने उस शोध को रोकने की पूरी कोशिश की। डा. तलवार याद करते हैं कि 1956 में जब एआईआईएमएस खुला था तो उनकी नियुक्ति ऐसोसिएट प्रोफेसर के रूप में हुई थी। बाद में जब प्रोफेसर के पद सृजित हुए तो डॉ. तलवार सहित संस्थान के 22 लोगों को कोई वरीयता नहीं दी गई और बाहरी लोगों को नियुक्त किया गया। वह मानते हैं जब तक किसी संस्थान में कोई गाड फादर न हो, तब तक शोधार्थी सही ढंग से शोध नहीं कर सकता। 1970 में जब वह कुष्ठ रोग के टीके का क्लिनिकल ट्रायल कर रहे थे तब भी उन्हें भारी अवरोधों का सामना करना पड़ा था और इससे वह कार्य तीन वर्ष पीछे हो गया। डॉ. तलवार ने जनसंख्या नियंतण्रके टीके का ईजाद किया तो उस पर भी विवाद हुआ। कहा गया कि एंटी एचसीजी टीका महिलाओं को बांझ बना देता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जब डॉ. तलवार के शोधपत्र पर जनसंख्या परिषद के निदेशक डॉ शेल्डन का ध्यान गया तो भारत सरकार के तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. कर्ण सिंह को इसकी जानकारी दी गई। बाधाओं के बावजूद 1980 में इस टीके का पेटेंटीकरण हुआ। तलवार को कनाडा और राकफेलर संस्थान से आर्थिक सहायता मिली। यह भी आरोप है कि अक्सर शोध पर वरिष्ठ सदस्य अपना नाम पहले रखवाने का दबाव डालते हैं। जबकि शोध पत्र कनिष्ठ सहयोगी द्वारा तैयार किया गया होता है। जबकि विदेशों के मेडिकल जनरल में शोध पत्र तैयार करने वाले का नाम पहले और निरीक्षक का बाद में छपता है। भारत में यह प्रक्रिया एकदम उल्टी है। डा. अनूप मिश्रा जो अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के मेडिसिन विभाग में 30 वर्षों तक प्रोफेसर रहे, का भी आरोप है कि उनके कनिष्ठ सहयोगियों को एचआईवी पर शोध करने की अनुमति नहीं दी गई। यहां तक कि रोगी के रजिस्ट्रेशन, उसका नाम, पता और फोन नंबर आदि विभागाध्यक्ष किसी को नहीं बताते। यानी अफसरशाही शोध कायरें में बाधा पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ती। उनका अनुभव है कि अनुसंधान में काम आने वाले छोटे से छोटे उपकरण के लिए कई चैनलों से हो कर गुजरना पड़ता है। जबकि निजी संस्थानों में जैसे ही एथिक्स पैनल शोध पत्र को स्वीकृति देता है, एक महीने के भीतर शोध कार्य शुरू हो जाता है। वैज्ञानिक प्रगति के निमित्त आज हमें इन कमियों को दूर करने की आवश्यकता है, तभी ब्रेन ड्रेन को रोक सकते हैं। जरूरी नहीं कि यह ब्रेन देश से बाहर जाए। क्योंकि आज के समय में उसकी प्रतिभा का उपयोग कोई भी देश कहीं भी बैठ कर अपने हित में कर सकता है। वैज्ञानिकों के लिए शोध का अनुकूल माहौल होना चाहिए। नहीं तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां देश के अनुसंधानों का पेटेंट अपने नाम करवाती जाएंगी। और हमें इनका कोई श्रेय नहीं मिल पाएगा।
Monday, February 7, 2011
सूर्य की अति सक्रियता की आशंका से एरीज के वैज्ञानिक भी चिंतित
सावधान! 2012 में सूर्य बरपा सकता है कहर
माया सभ्यता के कलेंडर के आधार पर 2012 में पृथ्वी पर मानव जीवन की समाप्ति का दावा करने वाले दार्शनिकों की भविष्यवाणी क्या सही साबित होने जा रही है? हालांकि अभी तक इस बात का कोई वैज्ञानिक क्लू तो सामने नहीं आया है लेकिन सूर्य की गतिविधियों के अपेक्षाओं के अनुरूप घटित न होने से विश्वभर के वैज्ञानिक इस बात को लेकर जरूर चिंतित हैं कि 2012 में सूर्य की अति सक्रियता पृथ्वी पर जीवन को नष्ट नहीं तो प्रभावित अवश्य कर सकती है।
विश्व के वैज्ञानिकों के साथ ही नैनीताल के आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान एवं शोध संस्थान (एरीज) के वैज्ञानिक भी सूर्य की गतिविधियों पर नजर रखे हुए हैं। उनका निष्कर्ष है कि बीते दो वर्षों से सूर्य में अपेक्षित सक्रियता नहीं है लेकिन 2012 में सूर्य में सक्रिया बहुत अधिक बढ़ सकती है जो पृथ्वी के बाहरी वातावरण (आयोनोस्फेयर) में सौर्य वातावरण (सोलर वैदर) को प्रभावित कर सकती है। सूर्य की गतिविधियों पर सतत नजर रखे वैज्ञानिक डा. अभिषेक श्रीवास्तव ने इस संबंध में बताया कि सूर्य की चौबीसवीं सोलर साइकिल लगभग तीन साल पहले प्रारंभ हुई थी। एक साइकिल ग्यारह वर्ष की होती है। इस दौरान सूर्य पर सोलर फ्लेयर सन स्पॉट आदि गतिविधियों में उतार चढ़ाव होते रहता है। इससे पृथ्वी का वातावरण संतुलित रहता है लेकिन बीते दो वर्षों से सूर्य पर गतिविधियां बहुत ही न्यूनतम हैं तथा फ्लेयर्स और सन स्पॉट अपेक्षा से बहुत कम हैं। डा.श्रीवास्तव ने बताया कि गतिविधियों के कम होने से वैज्ञानिकों को आशंका है कि 2012 में यह गतिविधियां एकाएक बहुत बढ़कर चरम पर पहुंच सकती हैं। इससे सूर्य से होने वाला सीएमई भी बहुत बढ़ सकता है। उन्होंने बताया कि इससे पृथ्वी पर किसी नुकसान की कोई संभावनाएं अभी तक नजर नहीं आती, लेकिन आयोनोस्फेयर प्रभावित होने से सैटेलाइट्स पर इसका आंशिक प्रभाव पड़ सकता है। एरीज के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा.वहाबुद्दीन ने बताया कि मानव निर्मित सभी सैटेलाइट्स अयोनोस्फेयर में ही स्थित हैं। यदि आशंका के अनुरूप 2012 में सोलर गतिविधि बढ़ी तो वह उनपर प्रभाव पड़ सकता है। इसका असर विशेषकर दूरसंचार तथा अन्य सुविधाओं पर पड़ सकता है। हवाई सेवाएं तथा सैटेलाइट्स से संचालित होने वाली अन्य सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार यदि ऐसी स्थिति आए तो इसे पहले ही नियंत्रित कर सकने के उपाय भी फिलहाल उपलब्ध नहीं हैं जो कि वैज्ञानिकों की चिंताओं को और बढ़ा रहा है।
Saturday, January 15, 2011
विज्ञान और विकास की अनोखी राहें
नोबेल पुरस्कार विजेता वेंकी ने कुछ शब्दों में ही विज्ञान का सार समझा दिया। उनकी मान्यता है कि हम सब जन्मजात वैज्ञानिक हैं, लेकिन जैसे- जैसे बड़े होते हैं, हम वैज्ञानिक बनना भूल जाते हैं। बालक- पेड़-पौधों, कीड़े-मकोड़े, नीले आकाश और लाल सूरज के बारे में उत्सुक रहते हैं। बच्चों द्वारा पूछे गए सवालों पर माता-पिता उन्हें टरका देते हैं। यह ठीक नहीं है। जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हम नीले आकाश को देखते रहते हैं और प्रश्न करने से कतराते हैं
आप सब घर लौट आइये, देश को आपकी जरूरत है- यह संदेश प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने चेन्नई में 98वीं विज्ञान कांग्रेस का उद्घाटन करते हुए दिया। वे चाहते हैं कि युवा वैज्ञानिक देश लौटकर यहां के तकनीकी विकास और नए-नए कौशल में हाथ बंटाए। यहां अनेक सुविधाएं और अनुसंधान के साधन हैं। हमारे विविद्यालय विदेशों में अध्ययन कर रहे युवा वैज्ञानिकों के लिए अपने द्वार खोल सकते हैं, ताकि वे अपने यहां रिसर्च करियर शुरू कर सकें। अब समय आ गया है, जब भारतीय विज्ञान और टेक्नोलॉजी कुछ ऊंचा सोचे और समय से आगे बढ़े। अब समय आ गया है कि हम 21वीं शताब्दी के रामानुजन और रामन पैदा कर सकते हैं। विज्ञान कांग्रेस अपने शताब्दी वर्ष (2012-2013) में वैज्ञानिक शोधकर्ताओं में एकदम नया प्रोफाइल ला सकती है, जिससे देश का नक्शा ही बदल जाए और नए अवसर पैदा किए जा सकें। प्रधानमंत्री चाहते हैं कि देश में विज्ञान जो अब तक नहीं कर पाया है वह करके दिखाए। हमारे अनुसंधान से नए-नए प्रोडक्ट बनाए जा सकते हैं। हमारे इनोवेशन से ऐसी चीजें बनाई जा सकती हैं, जो बाजारों में बिक सकें और यहां तक कि हम इनका निर्यात कर सकें। सर सीवी रामन के आविष्कार 80 वर्ष बाद भी हमारे
इस्तेमाल में आ रहे हैं, और हम नई चीजें बनाए जा रहे हैं। हमारे प्रवासी वैज्ञानिक नई तकनीकों और आविष्कारों पर काम कर सकते हैं। वे विज्ञान और विकास की नई राहें खोल सकते हैं। ऐसी बात नहीं है कि भारत में विज्ञान की प्रगति के लिए अब तक कोई प्रयत्न नहीं किए गए हैं। 10 से 27 वर्ष के साढ़े तीन लाख से ज्यादा छात्रों को विज्ञान की पढ़ाई आगे बढ़ाने के लिए छात्रवृत्ति दी गई है। विज्ञानमंत्री कपिल सिब्बल ने घोषणा की है कि विदेश के बड़े से बड़े विविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों की तर्ज पर जल्द ही भारत के पास नवरत्न विविद्यालय होंगे जो सरकार के नियंतण्रसे मुक्त होंगे। केंद्रीय सरकार आधुनिक तथा विज्ञान टेक्नोलॉजी के नए-नए अंगों को आगे बढ़ाने के लिए एक वैज्ञानिक तथा इनोवेटिव रिसर्च एकेडमी स्थापित करेगी। देखना यह पड़ेगा कि नई-नई प्रयोगशालाएं और एकेडमी स्थापित होने से कहीं हमारी पहले की प्रयोगशालाएं अपना काम ठीक से न कर पाएं। उनका कोई महत्व ही न रहे। इसलिए नई-पुरानी प्रयोगशालाओं और संस्थानों में तालमेल बैठाना जरूरी है। नोबेल पुरस्कार विजेता अमत्र्य सेन का विज्ञान कांग्रेस में यह विचार सबसे सराहा गया कि ज्ञान और सद्भावना के लिए यह जरूरी है कि प्राचीन नालंदा विविद्यालय को पुनर्जीवित किया जाए। नालंदा की स्थापना बिहार में पांचवीं शताब्दी में की गई थी और यह 12वीं शताब्दी तक रहा, लेकिन इसे 1193 में हमलावरों ने नष्ट कर दिया गया। अब हम इसे पुनस्र्थापित करने के लिए चीन, सिंगापुर, और जापान सहायता दे रहे हैं। डॉ. सेन नालंदा विविद्यालय के बोर्ड के अध्यक्ष है। डॉ. अमत्र्य सेन विज्ञान कांग्रेस में नालंदा और विज्ञान शोध व अध्ययन पर भाषण दे रहे थे। उन्होंने बताया कि नालंदा का उद्देश्य ज्ञान और सद्भावना को बढ़ावा देना था। पूर्व में यहां 10 हजार छात्र और शोधकर्ता रहते थे। यहां धर्म और विज्ञान का अद्भुत मिशण्रथा। विज्ञान कांग्रेस में आए वैज्ञानिकों और नोबेल पुरस्कार विजेताओं में प्रसिद्ध रसायनिक वेंकी रामकृष्ण भी थे, जिन्हें 2008 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। जब उन्हें विज्ञान कांग्रेस का स्वर्ण पदक प्रधानमंत्री ने दिया तो हषर्ध्वनि और तालियों से सारा वातावरण गूंज गया। बाल विज्ञान कांग्रेस का उद्घाटन करते हुए वेंकी ने छात्रों से बड़े प्यार से बातचीत की। पहले दो दिन तक वे मूवी स्टार्स की तरह भीड़ से घिरे रहे और उनका फोटो लेने के लिए सब उतावले हो गए। इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए डा. रामकृष्णन ने कहा कि वैज्ञानिक कोई फिल्म स्टार नहीं है। वे केवल वैज्ञानिक हैं, जो प्रयोगशालाओं में काम करते हैं। उन्हें मूवी और क्रिकेट स्टारों की तरह न समझा जाए। सबका अलग- अलग काम है। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि मैं किसी भी जगह 15 मिनट बोलता हूं और मेरा शेष समय समारोह की कार्रवाई में चला जाता है। विज्ञान, जिज्ञासा, टेस्टिंग और प्रयोगों से संबंधित है और वैज्ञानिक होने के नाते मैं ज्ञान का भंडार भर रहा हूं, न कि भारत के लिए क्रिकेट खेल रहा हूं। विज्ञान एक वि उद्यम है, जहां संसार के एक भाग में होने वाली खोजों का लाभ अन्य भागों में उठाया जाता है। यह ट्रैफिक दोतरफा होना चाहिए क्योंकि इस समय केवल पश्चिम से वैज्ञानिक बहाव भारत की ओर ज्यादा है। भारत को विज्ञान में आत्म-भरित होना चाहिए। छात्रों से उन्होंने कहा- ‘मैं आपके साथ ईमानदार हूं। आप मुझसे असहमत होने के लिए स्वतंत्र है। यही विज्ञान है।’
इस प्रकार वेंकी ने कुछ शब्दों में ही विज्ञान का सार समझा दिया। उनकी मान्यता थी कि हम सब जन्मजात वैज्ञानिक हैं, लेकिन जैसे-जैसे बड़े होते हैं, हम वैज्ञानिक बनना भूल जाते हैं। बालक- पेड़-पौधों, कीड़े-मकोड़े, नीले आकाश और लाल सूरज के बारे में उत्सुक रहते हैं। वे माता पिता से कुछ पूछते हैं तो वे बच्चों को टरका देते हैं। यह ठीक नहीं है। जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हम नीले आकाश को देखते रहते हैं और प्रश्न करने से कतराते हैं। जलवायु परिवर्तन से सब देशों को चिंता है और इससे कृषि पर भी दुष्प्रभाव पड़ रहा है। विज्ञान कांग्रेस में कृषि विशेषज्ञ डॉ. एम एस स्वामीनाथन ने बताया कि हम इससे कैसे बच सकते हैं। हमारी कृषि मानसून पर निर्भर रहती है, इसलिए हमें अपनी कृषि पण्राली उसी के अनुसार ढालनी होगी। मानसून के उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखना होगा। प्राचीन समय में जब सिंचाई नहीं थी, किसान बाढ़ और सूखा का सामना करने के लिए तैयार रहते थे। उस समय जलवायु-अनुकूल खेती होती थी और मिश्रित फसल उगाते थे। हमें चाहिए कि हम अपने प्राचीन और देशी कृषि ज्ञान के दस्तावेज तैयार करें, जिससे वे हमारे काम आ सके। यह अच्छा है कि देश में फसलों और मौसम पर आधारित 127 कृषि जलवायु क्षेत्रों की पहचान की गई है। इसलिए हमें अपनी कृषि पण्राली उसी के अनुसार ढालने के प्रयत्न तेज करने होंगे। हम हर क्षेत्र में जलवायु जोखिम प्रबंधन शोध एवं प्रशिक्षण केंद्र स्थापित कर सकते हैं। ये केन्द्र वैकल्पिक फसलीकरण नीतियां और प्रतिकूल परिस्थितियों को रोकने की विधियां विकसित कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन का जिक्र करते हुए केंद्रीय नियंतण्रबोर्ड के अध्यक्ष डा. गौतम ने कहा कि जो रसायन नुकसान पहुंचाते हैं, उनका इस्तेमाल हमें नहीं करना चाहिए। हमारे यहां इलेक्ट्रॉनिक और प्लास्टिक कचरा एक बड़ी समस्या बनते जा रहे हैं, जिसका समाधान हम नहीं कर पा रहे। देश में प्रतिवर्ष चार लाख टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा हो रहा है, और हम केवल 83 हजार टन का निपटान कर पा रहे हैं। यही हाल प्लास्टिक कचरे का है। भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान में अब तक अच्छी प्रगति की है, और इसका लाभ हम दूसरे देशों को भी दे रहे हैं। लघु उपग्रह केंद्र के निर्देशक डा. एलेक्स ने कहा कि छोटे उपग्रहों से हमें बहुत कुछ लाभ हो सकते हैं। ये उपग्रह संचार, मौसम और कृषि विज्ञान में बहुत उपयोगी हैं, इसलिए हमें इनका विकास करना चाहिए। पिछले 30 वर्ष में कम वजन के एक हजार से ज्यादा उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे गए हैं। इनसे महत्वपूर्ण सूचनाएं मिली हैं। एक कॉलेज के छात्रों ने ऐसा ही एक लघु उपग्रह बनाया है। भारतीय वैज्ञानिकों का एक दल भूकम्प अध्ययन के लिए महाराष्ट्र के कोयना क्षेत्र में जमीन से 8 किलोमीटर नीचे एक छोटी प्रयोगशाला स्थापित करेगा। भूकम्प की दृष्टि से यह क्षेत्र संवेदनशील है। यहां 20 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में भूकम्प आते रहते हैं। नई प्रयोगशाला से ज्ञान होगा कि भूकम्प आने से पहले और उसके दौरान क्या होता है। यह अच्छा है कि कोयना क्षेत्र में हाल में कोई बड़ा भूकम्प नहीं आया है। इस वर्ष विज्ञान कांग्रेस में एक नए उत्साह की झलक देखी गई। आगे की अनेक तैयारियां की गई हैं और प्रस्तावित योजनाओं को अमल में लाने के प्रयत्न होंगे। सफलता ही सबकी कुंजी है।
आप सब घर लौट आइये, देश को आपकी जरूरत है- यह संदेश प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने चेन्नई में 98वीं विज्ञान कांग्रेस का उद्घाटन करते हुए दिया। वे चाहते हैं कि युवा वैज्ञानिक देश लौटकर यहां के तकनीकी विकास और नए-नए कौशल में हाथ बंटाए। यहां अनेक सुविधाएं और अनुसंधान के साधन हैं। हमारे विविद्यालय विदेशों में अध्ययन कर रहे युवा वैज्ञानिकों के लिए अपने द्वार खोल सकते हैं, ताकि वे अपने यहां रिसर्च करियर शुरू कर सकें। अब समय आ गया है, जब भारतीय विज्ञान और टेक्नोलॉजी कुछ ऊंचा सोचे और समय से आगे बढ़े। अब समय आ गया है कि हम 21वीं शताब्दी के रामानुजन और रामन पैदा कर सकते हैं। विज्ञान कांग्रेस अपने शताब्दी वर्ष (2012-2013) में वैज्ञानिक शोधकर्ताओं में एकदम नया प्रोफाइल ला सकती है, जिससे देश का नक्शा ही बदल जाए और नए अवसर पैदा किए जा सकें। प्रधानमंत्री चाहते हैं कि देश में विज्ञान जो अब तक नहीं कर पाया है वह करके दिखाए। हमारे अनुसंधान से नए-नए प्रोडक्ट बनाए जा सकते हैं। हमारे इनोवेशन से ऐसी चीजें बनाई जा सकती हैं, जो बाजारों में बिक सकें और यहां तक कि हम इनका निर्यात कर सकें। सर सीवी रामन के आविष्कार 80 वर्ष बाद भी हमारे
इस्तेमाल में आ रहे हैं, और हम नई चीजें बनाए जा रहे हैं। हमारे प्रवासी वैज्ञानिक नई तकनीकों और आविष्कारों पर काम कर सकते हैं। वे विज्ञान और विकास की नई राहें खोल सकते हैं। ऐसी बात नहीं है कि भारत में विज्ञान की प्रगति के लिए अब तक कोई प्रयत्न नहीं किए गए हैं। 10 से 27 वर्ष के साढ़े तीन लाख से ज्यादा छात्रों को विज्ञान की पढ़ाई आगे बढ़ाने के लिए छात्रवृत्ति दी गई है। विज्ञानमंत्री कपिल सिब्बल ने घोषणा की है कि विदेश के बड़े से बड़े विविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों की तर्ज पर जल्द ही भारत के पास नवरत्न विविद्यालय होंगे जो सरकार के नियंतण्रसे मुक्त होंगे। केंद्रीय सरकार आधुनिक तथा विज्ञान टेक्नोलॉजी के नए-नए अंगों को आगे बढ़ाने के लिए एक वैज्ञानिक तथा इनोवेटिव रिसर्च एकेडमी स्थापित करेगी। देखना यह पड़ेगा कि नई-नई प्रयोगशालाएं और एकेडमी स्थापित होने से कहीं हमारी पहले की प्रयोगशालाएं अपना काम ठीक से न कर पाएं। उनका कोई महत्व ही न रहे। इसलिए नई-पुरानी प्रयोगशालाओं और संस्थानों में तालमेल बैठाना जरूरी है। नोबेल पुरस्कार विजेता अमत्र्य सेन का विज्ञान कांग्रेस में यह विचार सबसे सराहा गया कि ज्ञान और सद्भावना के लिए यह जरूरी है कि प्राचीन नालंदा विविद्यालय को पुनर्जीवित किया जाए। नालंदा की स्थापना बिहार में पांचवीं शताब्दी में की गई थी और यह 12वीं शताब्दी तक रहा, लेकिन इसे 1193 में हमलावरों ने नष्ट कर दिया गया। अब हम इसे पुनस्र्थापित करने के लिए चीन, सिंगापुर, और जापान सहायता दे रहे हैं। डॉ. सेन नालंदा विविद्यालय के बोर्ड के अध्यक्ष है। डॉ. अमत्र्य सेन विज्ञान कांग्रेस में नालंदा और विज्ञान शोध व अध्ययन पर भाषण दे रहे थे। उन्होंने बताया कि नालंदा का उद्देश्य ज्ञान और सद्भावना को बढ़ावा देना था। पूर्व में यहां 10 हजार छात्र और शोधकर्ता रहते थे। यहां धर्म और विज्ञान का अद्भुत मिशण्रथा। विज्ञान कांग्रेस में आए वैज्ञानिकों और नोबेल पुरस्कार विजेताओं में प्रसिद्ध रसायनिक वेंकी रामकृष्ण भी थे, जिन्हें 2008 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। जब उन्हें विज्ञान कांग्रेस का स्वर्ण पदक प्रधानमंत्री ने दिया तो हषर्ध्वनि और तालियों से सारा वातावरण गूंज गया। बाल विज्ञान कांग्रेस का उद्घाटन करते हुए वेंकी ने छात्रों से बड़े प्यार से बातचीत की। पहले दो दिन तक वे मूवी स्टार्स की तरह भीड़ से घिरे रहे और उनका फोटो लेने के लिए सब उतावले हो गए। इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए डा. रामकृष्णन ने कहा कि वैज्ञानिक कोई फिल्म स्टार नहीं है। वे केवल वैज्ञानिक हैं, जो प्रयोगशालाओं में काम करते हैं। उन्हें मूवी और क्रिकेट स्टारों की तरह न समझा जाए। सबका अलग- अलग काम है। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि मैं किसी भी जगह 15 मिनट बोलता हूं और मेरा शेष समय समारोह की कार्रवाई में चला जाता है। विज्ञान, जिज्ञासा, टेस्टिंग और प्रयोगों से संबंधित है और वैज्ञानिक होने के नाते मैं ज्ञान का भंडार भर रहा हूं, न कि भारत के लिए क्रिकेट खेल रहा हूं। विज्ञान एक वि उद्यम है, जहां संसार के एक भाग में होने वाली खोजों का लाभ अन्य भागों में उठाया जाता है। यह ट्रैफिक दोतरफा होना चाहिए क्योंकि इस समय केवल पश्चिम से वैज्ञानिक बहाव भारत की ओर ज्यादा है। भारत को विज्ञान में आत्म-भरित होना चाहिए। छात्रों से उन्होंने कहा- ‘मैं आपके साथ ईमानदार हूं। आप मुझसे असहमत होने के लिए स्वतंत्र है। यही विज्ञान है।’
इस प्रकार वेंकी ने कुछ शब्दों में ही विज्ञान का सार समझा दिया। उनकी मान्यता थी कि हम सब जन्मजात वैज्ञानिक हैं, लेकिन जैसे-जैसे बड़े होते हैं, हम वैज्ञानिक बनना भूल जाते हैं। बालक- पेड़-पौधों, कीड़े-मकोड़े, नीले आकाश और लाल सूरज के बारे में उत्सुक रहते हैं। वे माता पिता से कुछ पूछते हैं तो वे बच्चों को टरका देते हैं। यह ठीक नहीं है। जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हम नीले आकाश को देखते रहते हैं और प्रश्न करने से कतराते हैं। जलवायु परिवर्तन से सब देशों को चिंता है और इससे कृषि पर भी दुष्प्रभाव पड़ रहा है। विज्ञान कांग्रेस में कृषि विशेषज्ञ डॉ. एम एस स्वामीनाथन ने बताया कि हम इससे कैसे बच सकते हैं। हमारी कृषि मानसून पर निर्भर रहती है, इसलिए हमें अपनी कृषि पण्राली उसी के अनुसार ढालनी होगी। मानसून के उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखना होगा। प्राचीन समय में जब सिंचाई नहीं थी, किसान बाढ़ और सूखा का सामना करने के लिए तैयार रहते थे। उस समय जलवायु-अनुकूल खेती होती थी और मिश्रित फसल उगाते थे। हमें चाहिए कि हम अपने प्राचीन और देशी कृषि ज्ञान के दस्तावेज तैयार करें, जिससे वे हमारे काम आ सके। यह अच्छा है कि देश में फसलों और मौसम पर आधारित 127 कृषि जलवायु क्षेत्रों की पहचान की गई है। इसलिए हमें अपनी कृषि पण्राली उसी के अनुसार ढालने के प्रयत्न तेज करने होंगे। हम हर क्षेत्र में जलवायु जोखिम प्रबंधन शोध एवं प्रशिक्षण केंद्र स्थापित कर सकते हैं। ये केन्द्र वैकल्पिक फसलीकरण नीतियां और प्रतिकूल परिस्थितियों को रोकने की विधियां विकसित कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन का जिक्र करते हुए केंद्रीय नियंतण्रबोर्ड के अध्यक्ष डा. गौतम ने कहा कि जो रसायन नुकसान पहुंचाते हैं, उनका इस्तेमाल हमें नहीं करना चाहिए। हमारे यहां इलेक्ट्रॉनिक और प्लास्टिक कचरा एक बड़ी समस्या बनते जा रहे हैं, जिसका समाधान हम नहीं कर पा रहे। देश में प्रतिवर्ष चार लाख टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा हो रहा है, और हम केवल 83 हजार टन का निपटान कर पा रहे हैं। यही हाल प्लास्टिक कचरे का है। भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान में अब तक अच्छी प्रगति की है, और इसका लाभ हम दूसरे देशों को भी दे रहे हैं। लघु उपग्रह केंद्र के निर्देशक डा. एलेक्स ने कहा कि छोटे उपग्रहों से हमें बहुत कुछ लाभ हो सकते हैं। ये उपग्रह संचार, मौसम और कृषि विज्ञान में बहुत उपयोगी हैं, इसलिए हमें इनका विकास करना चाहिए। पिछले 30 वर्ष में कम वजन के एक हजार से ज्यादा उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे गए हैं। इनसे महत्वपूर्ण सूचनाएं मिली हैं। एक कॉलेज के छात्रों ने ऐसा ही एक लघु उपग्रह बनाया है। भारतीय वैज्ञानिकों का एक दल भूकम्प अध्ययन के लिए महाराष्ट्र के कोयना क्षेत्र में जमीन से 8 किलोमीटर नीचे एक छोटी प्रयोगशाला स्थापित करेगा। भूकम्प की दृष्टि से यह क्षेत्र संवेदनशील है। यहां 20 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में भूकम्प आते रहते हैं। नई प्रयोगशाला से ज्ञान होगा कि भूकम्प आने से पहले और उसके दौरान क्या होता है। यह अच्छा है कि कोयना क्षेत्र में हाल में कोई बड़ा भूकम्प नहीं आया है। इस वर्ष विज्ञान कांग्रेस में एक नए उत्साह की झलक देखी गई। आगे की अनेक तैयारियां की गई हैं और प्रस्तावित योजनाओं को अमल में लाने के प्रयत्न होंगे। सफलता ही सबकी कुंजी है।
Thursday, December 23, 2010
अल्जाइमर पर काबू पाने की कोशिश
अल्जाइमर यानी याददाश्त खोने वाली बीमारी आज एक दुसाध्य बीमारी के रूप में जगह चुकी है। खासकर महानगरों में इसका प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। यही कारण है कि इस पर काबू पाने के लिए लगातार शोध हो रहे हैं। इसकी एक उम्मीद है नैनो बोट मशीन। यह मशीन मनुष्य की धमनी के भीतर फिट की जाएगी जो उसकी याददाश्त को तरोताजा करती रहेगी। नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस के ऑनलाइन एडीशन में दी गई जानकारी के अनुसार मिशिगन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक उक्त मशीन को बनाने में सफल माने जा रहे हैं। विश्वविद्यालय के ऐसोसिएट प्रॉफेसर मेहमेत फतिह यानिक अपने सहयोगियों के साथ इस तकनीक पर काम कर रहे हैं। एक सव्रेक्षण के अनुसार दुनिया में 2006 में दो करोड़ साठ लाख लोग अल्जाइमर की चपेट में थे और आज यह संख्या सात करोड़ अस्सी लाख के करीब पहुंच गई है। अकेले अमेरिका में 53 लाख लोग अपनी याददाश्त खो चुके हैं। यदि समय रहते इसका माकूल इलाज नहीं ढूंढा गया तो इस संख्या में दिन-ब-दिन इजाफा होता रहेगा। इस बीमारी का प्रभाव प्रॉढ़ व्यक्तियों पर ज्यादा होता है। उम्र बढ़ने के साथ दिमाग अपनी स्मरण शक्ति पर नियंत्रण रखने में अक्षम होता जाता है जिसका विशेष कारण होता है दिमागी कसरत न करने की आदत। जो लोग लगातार दिमाग पर जोर देकर काम करते रहते हैं उनके दिमाग की कसरत होती रहती है। यानी वे दिमागी तौर पर स्वस्थ रहते हैं। दिमाग की निष्क्रियता के चलते ही अल्जाइमर धर दबोचता है। अत: दिमागी मशीन का इस्तेमाल लगातार करते रहना चाहिए। वैसे यह बीमारी किसी भी उम्र में व्यक्ति को शिकार बना सकती है लेकिन बुढ़ापे की ओर अग्रसर व्यक्ति को इसका विशेष खयाल रखने की आवश्यकता है। हाल में वैज्ञानिकों ने हवाई यात्रा करने के बाद 24 घंटे तक याददाश्त खोने जैसी समस्या का जिक्र भी किया है। यानी अधिक हवाई यात्रा करने से व्यक्ति लंबी अवधि तक इस बीमारी का शिकार हो सकता है। इसी को ध्यान में रख कर वैज्ञानिकों ने नैनो बोट मशीन का ईजाद किया है जो मानव की धमनी में फिट होकर उसकी याददाश्त को सक्रिय रखने का काम करेगी। हालांकि अभी इसे आम आदमी तक पहुंचने में समय लगेगा। अनुमान है कि कम से कम दो दशक बाद ही यह उपलब्ध हो पायेगी। इस तकनीक के सफल होने के बाद मेडिकल सांइस में बहुत से आविष्कारों की संभावनाएं बलवती हुई हैं। जैसे हड्डियों में कैल्शियम की कमी से होनेवाले आर्थराइटिस के उपचार या दुर्घटना के कारण क्षतिग्रस्त हो चुके अंगों को सही करने में भी मदद मिलेगी और तंत्रिका तंत्र की बीमारियों को भी ठीक किया जा सकेगा। इसी प्रकार मनोचिकित्सा के क्षेत्र में भी नैनो बोट कंप्यूटर बहुत सहायक सिद्ध हो सकते हैं। याददाश्त लौटाने से बुढ़ापे पर भी काबू पाया जा सकेगा। यदि सही में वैज्ञानिकों को इस तकनीक में सफलता मिलती है तो इसके बगैर मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकेगी। लेकिन ‘अति सर्वत्रं वर्जयेत’ की उक्ति को ध्यान में रखते हुए एक लक्ष्मण रेखा अवश्य खींचनी होगी और तय करना होगा कि उसे पार करना ठीक नहीं। भविष्य की इस तकनीक से न केवल गंभीर नैतिक मूल्यों के मुद्दे उठेंगे, बल्कि सुरक्षा से संबंधित मामले भी खतरे में पड़ जाएंगे। तीव्र तकनीक विकास से मनुष्य पूरी तरह तकनीकी आश्रित हो जाएगा। यह भी संभव है कि हमारे जीवन में तकनीक का अधिक हस्तक्षेप होने से हम रोबोट की तरह हो जाएं। वैज्ञानिक भी मानते रहे हैं कि कुछ नया सीखने के लिए मनुष्य को भूलना भी आवश्यक है। यांत्रिकी से हम पूरे जीवन की यादों को भंडारित कर निजी जीवन में भारी हस्तक्षेप करेंगे। बदलती जीवन शैली इस बीमारी का प्रमुख कारण माना जा सकता है। कंप्यूटर युग में हम सारा काम मशीन के माध्यम से करने के आदी हो गए हैं। छोटी-बड़ी किसी भी खरीदारी का हिसाब जोड़ने से लेकर समय और दिन तक पता करने के लिए हम यंत्रों पर आश्रित हैं। बड़ी-बड़ी गणनाओं के लिए तो कंप्यूटर या कैलकुलेटर जैसी मशीनें ठीक हैं पर सामान्य गणनाओं के लिए जहां तक हो सके, दिमागी मशीन का ही उपयोग किया जाना चाहिए। तभी हम अल्जाइमर जैसी बीमारी से बच सकते हैं। याददाश्त जिंदा रखने के लिए शरीर में मशीन फिट करने की नौबत न आए सबसे पहले यही कोशिश होनी चाहिए। प्रॉकृतिक उपचार के जरिए ही याददाश्त को लंबे समय तक जिंदा रखने का य8 होना चाहिए और इसके लिए बचपन से ही प्रयासरत रहना चाहिए। माता-पिता और अध्यापकों द्वारा बच्चों के सीखने-सिखाने की पद्धति में परिवर्तन करना होगा। बच्चों से लगातार बिना किसी मशीन के जरिये गणित का अभ्यास करवाया जाना चाहिए। हम जितनी अधिक भाषायें बोलेंगे उतनी ही अधिक दिमागी कसरत होगी और अल्जाइमर जैसी बीमारी से दूर रहेंगे। भले ही नैनो तकनीक अपना काम करती रहे लेकिन दिमागी मशीन की सक्रियता बराबर बनी रहनी जरूरी है।
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