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Monday, April 25, 2011
Friday, April 22, 2011
अंतरिक्ष में तिरंगे की शान
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र, इसरो ने एक बार फिर शान से अंतरिक्ष में देश का तिरंगा लहरा दिया है। इसरो के पोलर सेटेलाइट लाउंच वेहिकल, पीएसएलवी ने कामयाबी की सत्रहवीं उड़ान भरते हुए तीन सेटेलाइटों को एक साथ अंतरिक्ष की विभिन्न कक्षाओं में स्थापित कर दिया। इसके साथ ही इसरो की पिछली असफलता का वह दाग भी धुल गया जब उसके दो जीएसएलवी सेटेलाइट उड़ान भरने के साथ ही असफल होकर गिर गए थे। इस सफलता ने इसरो के उस दाग पर भी मरहम लगाने का काम किया होगा जिसमें उसके एस बैंड सेटेलाइट के लिए एक निजी कंपनी से अवैध करार ने खासा हंगामा मचाया था। इस सफलता ने पीएसएलवी की तकनीक पर श्रेष्ठता की मुहर लगा दी है और भारत अब दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जिनके सबसे अधिक रिमोट सेंसिंग सेटेलाइट अंतरिक्ष में मंडरा रहे हैं। पीएसएलवी ने अब तक अट्ठारह बार उड़ान भरी है जिसमें केवल पहली उड़ान असफल हुई है। वर्ष 1993 की इस पहली असफलता के बाद पीएसएलवी ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा है। अपनी सत्रह उड़ानों में इसने कुल 47 सेटेलाइट अंतरिक्ष में स्थापित किए हैं जिनमें 21 भारत के हैं। भारत ने अपना पहला रिमोट सेंसिंग सेटेलाइट वर्ष 1988 में रूसी रॉकेट की मदद से अंतरिक्ष भेजा था। लेकिन, अब इस क्षेत्र में भारत की तकनीकी श्रेष्ठता दुनिया मान रही है। आज अमेरिका, रूस, इंग्लैंड और फ्रांस जैसे देश इसरो के साथ भागीदारी को लालायित रहते हैं। तकनीकी श्रेष्ठता और सस्ता होने के कारण दुनिया के तमाम देश इसके रॉकेट और सेटेलाइटों के लिए लाइन लगाए रहते हैं। इस बार जो तीन सेटेलाइट भेजे गए हैं उनमें एक तो सिंगापुर का है और इसके अपने मुख्य सेटेलाइट रिसोर्ससेट-2 से मिले आंकड़ों का इस्तेमाल दुनिया भर के देश करेंगे। रिसोर्ससेट-2 में लगे तीन कैमरों से फसलों का अध्ययन, पहाड़ों पर जमने वाली बर्फ के आंकड़े, ग्लेशियरों की हालत, जमीन के अंदर मौजूद जल का पता लगाना और ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों का जाल बिछाने के लिए आवश्यक आंकड़े इकट्ठे करने जैसे महत्वपूर्ण कायरे को अंजाम दिया जाएगा। आने वाले महीनों में इसरो कम्यूनिकेशन, माइक्रोवेव रिमोट सेंसिंग सेटेलाइटों की श्रृंखला छोड़ने जा रहा है। आपको याद होगा कि इसरो के चंद्रयान-1 अभियान में पहली बार चंद्रमा पर पानी होने का पता लगा था। अब चंद्रयान-2 पर जोर शोर से काम चल रहा है। रूस के साथ संयुक्त अभियान के रूप में चलने वाला यह सेटेलाइट अगले दो वर्षो में छोड़ा जाने वाला है। इसके अलावा अमेरिका ने 2016 के अपने मूनराइज अभियान में भारत से भागीदारी की इच्छा जताई है। इस अभियान में चंद्रमा से कई तरह के नमूने इकट्ठे किए जाएंगे और इसके लिए चंद्रमा तक जाने वाला सेटेलाइट भारत प्रदान करेगा। इस प्रकार भारत ने न केवल रॉकेट तकनीक में उच्च हुनर हासिल कर लिया है बल्कि इसके बनाए सेटेलाइटों की मांग भी तेजी से बढ़ रही है।
Monday, April 18, 2011
क्यूरियोसिटी करेगा अब तक की मंगल की सबसे बड़ी पड़ताल
पिछली कुछ सदियों से सौरमंडल के जिस ग्रह ने धरती पर सबसे ज्यादा दिलचस्पी जगाई है, वह है हमारा पड़ोसी ग्रह मंगल कुछ दशक पहले तक भी लोगों का प्रबल विश्वास था (कुछ हद तक अब भी) कि पृथ्वी की तरह वहां भी कोई विकसित सभ्यता हो सकती है। 1965 में मंगल के पास से गुजरे नासा के अंतरिक्षयान वॉयजर ने इसके चित्र भेजे तो इस 'लाल ग्रह' के बारे में कई नई बातें सामने आई कि पृथ्वी से मिलता-जुलता यह ग्रह वास्तव में उससे कितना भिन्न है और उसके बारे में जानकारियां जुटाना बेहद चुनौती भरा काम है। इस क्रम में पिछले पांच दशकों से मंगल को खंगालने का काम जारी है लेकिन मंगल से जुड़े अभियानों पर अरबों डालर खर्च करने के बाद भी अब तक हम यह नहीं जान पाए हैं कि क्या मंगल पर कभी जीवन था, यदि था तो कैसा था और क्यों विलुप्त हुआ? इसी तरह, क्या मंगल के हिमाच्छादित ध्रुवों और सतह के नीचे सूक्ष्मजीवियों का अस्तित्व है? सौरमंडल की शुरुआती पड़ताल के अभियान मंगल ग्रह के पास से गुजरते हुए अंतरिक्षयानों द्वारा उसके फोटो लेने तक सीमित थे। जैसे-जैसे तकनीकी क्षमताएं बढ़ती गई, अंतरिक्षयानों को मंगल की कक्षा में भेजना संभव हुआ जिससे वे उसके चारों ओर घूमते हुए उसकी जानकारी जुटाने लगे। तकनीकी क्षमताएं और बढ़ीं तो मंगल की सतह पर लैंडर और रोबर्स को उतारना संभव हो गया। इतना ही नहीं, वहां उतारे गए रोबोटिक यानों को सतह पर घुमाना और जानकारियां जुटाने में कामयाबी मिलने लगी। मंगल पर रोबोटिक यान उतारने की इस कड़ी में अब तक के तमाम रिकार्ड तोड़ने को तैयार है 2.3 अरब डॉलर की लागत वाला क्यूरियोसिटी नामक रोबर, जिसे इन दिनों नासा के वैज्ञानिक और इंजीनियरअंतिम रूप देने में जुटे हैं। क्यूरियोसिटी को इस साल के अंत में नवम्बर और दिसम्बर के बीच मंगल के लिए रवाना किया जाएगा। यह अगले साल के मध्य तक मंगल ग्रह पर पहुंचेगा। मंगल पर अब तक भेजे गए रोवर्स जैसे कि सोजोर्नर, स्पिरिट, अपॉच्युर्निटी की तुलना में इसके कार्य एकदम अलग और बेहद जानकारी पूर्ण होंगे।
Monday, April 11, 2011
'फ्लाइंग' पनडुब्बी से खुलेंगे समुद्र की गहराइयों के राज
यह बात अक्सर कही जाती है कि जितना ज्यादा हम पृथ्वी से बाहर सौरमंडल के ग्रहों के बारे में जानते हैं, उतना ही कम अपने महासागरों की गहराइयों के बारे में जानते हैं। चांद पर कई लोग उतर चुके हैं लेकिन अभी तक हम महासागर की गहराइयों में 20,000 फीट से ज्यादा दूर तक नहीं जा पाए हैं। सागर की इन गहराइयों में न जाने कितने रहस्य छिपे हैं जिनसे पर्दा उठना बाकी है। शायद इसी बात से प्रेरित हो ब्रिटिश अरबपति रिचार्ड ब्रानसन ने छोटी-सी पनडुब्बी में दुनिया के पांचों महासागरों के सबसे गहरे स्थलों में पहली बार उतरने की योजना बनाई है जिसका उन्होंने हाल ही में खुलासा किया है। वर्जिन ओशनिक नामक यह पनडुब्बी इस साल के अंत में पश्चिमी प्रशांत महासागर के सबसे गहरे स्थल से यात्रा शुरू कर उस क्षेत्र का नक्शा तैयार करेगी और गहराइयों के नमूने लेगी। अभी तक महासागरों की गहरी खाइयों तक रोबोटिक वाहनों के जरिये ही पहुंचा जा सका है। ब्रानसन के मुताबक, 'अंतरिक्ष में तो मनुष्य ने काफी पहले कदम रख लिए हैं, और अब व्यावसायिक अंतरिक्ष पर्यटन की शुरुआत होने वाली है लेकिन अपने ग्रह के महासागरों की गहराइयों तक पहुंचना और उनके बारे में जानना अभी तक भी हमारे लिए अहम चुनौती बनी हुई है।'
इस अभियान में ब्रानसन अमेरिकी सेलर और एक्सप्लोरर क्रिश वेल्श के साथ सह पायलट होंगे। पंख वाली तथा स्पेस शटल के आकार की इस पनडुब्बी के मुख्य पायलट क्रिश ही होंगे। दो वर्षो के अंतराल में यह पनडुब्बी पांच बार महासागरों के सबसे गहरे स्थल में उतरेगी। इन दिनों यह पनडुब्बी महासागरों की गहराइयों में भारी दबाव को झेलने के परीक्षणों के दौर से गुजर रही है। परीक्षण सफल रहा तो चीफ पायलट वेल्श द्वारा इस साल के आखिर तक इसे प्रशांत महासागर के अब तक ज्ञात सबसे गहरे स्थल मैरियाना ट्रेंच में उतारा जाएगा। मैरियाना ट्रेंच की गहराई 10,924 मीटर है। इस पहली यात्रा के 'बैक-अप' पायलट ब्रानसन तब लाल, नीले और सफेद रंग की पनडुब्बी को अटलांटिक महासागर की प्यूटरे रिको खाई में उतारेंगे। अभी तक इसकी खोजबीन नहीं की जा सकी है। इसकी गहराई 8,605 मीटर है। ब्रानसन की पनडुब्बी यदि सफलतापूर्वक मैरियाना ट्रेंच के तल तक पहुंचने में कामयाब हो जाती है तो यह अमेरिकी नेवी की रोबोटिक पनडुब्बी 'ट्रीस्टी' के बाद पहुंचने वाली पहली मानवयुक्त पनडुब्बी होगी। यह पनडुब्बी 23 जनवरी 1960 में यहां पहुंची थी। इसके बाद यहां कोई नहीं पहुंचा। वर्जिन पनडुब्बी अपने 'पंखों' से समुद्र तल पर 10 किलोमीटर तक 'उड़' सकती है और 24 घंटे तक खुद का संचालन करते हुए पहले कभी न देखे गए समुद्री जीवन के चित्र ले सकती है। वेल्श के मुताबिक इस एडवेंचर के खतरे भी कम नहीं है क्योंकि इसे सामान्य से 1,000 गुना ज्यादा वायुमंडलीय दबाव झेलना होगा। यह पनडुब्बी 8,000 पाउंड कार्बन फाइबर की बनी हुई है और चारों ओर देखने के लिए क्वाट्र्ज का गुबंद बना हुआ है। पनडुब्बी पर आया जरा सा भी 'लीक' आदमी को ही नहीं, इस्पात को भी चीरकर रख देगा जिससे मौत निश्चित है। इतनी गहराई पर किसी तरह का बचाव भी संभव नहीं होगा। इस प्रोजेक्ट के वैज्ञानिक उद्देश्य हैं और इससे समुद्र का अध्ययन करने वाली कई यूनिवर्सिटियां जुड़ी हुई हैं। इस प्रोजेक्ट के बाद 60 वर्षीय ब्रानसन का अगले साल की शुरुआत में वर्जिन गैलेटिक प्रोजेक्ट शुरू हो रहा है जिसके तहत व्यावसायिक अंतरिक्ष पर्यटन की शुरुआत होगी। रिचार्ड ब्रानसन का नया एडवेंचर धरती (महासागर) पर सबसे गहरे स्थल मैरियाना ट्रेंच: 35,840 फीट/10,924 मीटर (प्रशांत महासागर) प्यूटरे रिको ट्रेंच: 28, 374 फीट/8648 मीटर (अटलांटिक महासागर) यूरेसिया बेसिन: 17,881फीट/5450 मीटर (आर्कटिक महासागर) जावा ट्रेंच: 23,376 फीट/ 7125 मीटर (ंिहंद महासागर) सैंडविच ट्रेंच: 23,736फीट/ 7235 मीटर (सदर्न ओशन)
Sunday, April 10, 2011
मौसम गरीबों के लिए होता है
विज्ञान सभी के लिए वरदान हो सकता है, अगर सभी में उसका उपयोग करने की आर्थिक क्षमता हो जाए। विज्ञान भी आदमी ने ही बनाया है और आर्थिक विषमता भी आदमी ने ही पैदा की है। स्पष्ट है कि जिसे मानवता के लिए वरदान कहा जा सकता है, वह सभी के लिए वरदान नहीं बन पाया है। जैसे धर्म पर कुछ लोगों ने कब्जा कर रखा था, वैसे ही विज्ञान पर भी कुछ लोगों ने कब्जा कर रखा है
जब हम आठवीं-नौवीं कक्षा में पढ़ते थे, तब निबंधों की हर पुस्तक में इस विषय पर निबंध जरूर होता था, विज्ञान: वरदान या अभिशाप। जाहिर है, सभी निबंधों में वरदान अभिशाप पर भारी पड़ता था। पिछली शताब्दी में विज्ञान ने जो बड़े-बड़े करतब किए हैं, उनमें एक महत्त्वपूर्ण घटना है मौसम पर नियंत्रण। यह मामूली बात नहीं है। मौसम किसी एक गांव या शहर का नहीं होता, बड़े इलाके का होता है। मौसम से संघर्ष करने के लिए मनुष्य ने क्या-क्या नहीं किया। अब जाकर सम्भव हुआ है कि जाड़े में हीटर और गरमी में एअरकंडीशनर जैसी सुविधाएं पैदा हो पाई हैं। जाड़े के दिनों में बहुत-से लोग अपने गरम घर से निकलते हैं, गरम गाड़ी में बैठ जाते हैं और फिर गरम दफ्तर में दाखिल हो जाते हैं। इसी तरह, गरमी में वे ठंडे घर से निकलते हैं, ठंडी गाड़ी में बैठ जाते हैं और ठंडे दफ्तर में काम करते हैं। शानदार लोग अपनी-अपनी शानदार कोठियों से बारिश का आनंद लेते हैं। जीत लिया है न, आदमी ने मौसम को? गरमी दबे पांवों से, आहिस्ता-आहिस्ता हमारी जिंदगी में दाखिल हो रही है। अनुमान है कि इस साल प्रचंड गरमी पड़ेगी। लेकिन कौन जानता है। अब ऋतुओं के बारे में भविष्यवाणी करना सम्भव नहीं रहा। आदमी कु छ सोचता है, हो कुछ और जाता है। होता तो पहले भी ऐसा ही होगा, पर इतनी जल्दी-जल्दी नहीं। मौसम किसी का गुलाम नहीं है। अब वह उच्छृंखल भी हो गया है। कारण जलवायु परिवर्तन है, जो हमारी अपनी करतूत है। लम्बे दौर में इससे अमीर-गरीब सभी प्रभावित होंगे। मनुष्य अब भी इतना सचेतन नहीं हो पाया है कि वह दूर भविष्य की सोच सके। उसकी नजर एक या दो पीढ़ियों से आगे नहीं जाती। शायद वह समय आ रहा जब हम सभी को आगे के लिए सोचना ही पड़ेगा। जापान में सुनामी के बाद परमाणु विकिरण इसका सिर्फ एक छोटा-सा सबूत है। बड़ी-बड़ी विभीषिकाएं नेपथ्य में प्रतीक्षा कर रही होंगी। गरमी अभी ठीक से आई नहीं है, पर जिनके पास एअरकंडीशनर है या हैं, वे उसमें या उनमें गैस भरवाने लग गए हैं। जो कू लर पर निर्भर हैं, वे अभी नहीं जागे हैं, पर जल्द ही वे भी सक्रिय हो जाएंगे। बिजली के पंखे ज्यादा भरोसेमंद और किफायती साथी हैं। कई-कई साल रिपेयर के बिना चलते हैं। लेकिन जिनके पास इनमें से कु छ भी नहीं है वे गरमी का अभिशाप वैसे ही भोगने की मानसिक तैयारी कर रहे हैं; जैसे उन्होंने जाड़ा बिताया था। बरसात में भी इस वर्ग का बुरा हाल होता है। जिन झोपड़ियों में वे रहते हैं, वे बरसात-प्रूफ नहीं होती हैं। उनमें रहने वाले पुरु षों और खासकर स्त्रियों को बरसते-रिसते-टपकते पानी से जूझने में अपनी आधी ऊर्जा झोंक देनी पड़ती है। इस तरह हम देख सकते हैं कि मौसम सिर्फ गरीबों के लिए होता है। जिनके पास साधन हैं, वे मौसम से प्रभावित नहीं होते। उनके घर, वाहन और काम करने की जगहें मौसम के मोड़ों से प्रभावित नहीं होते। ये सदाबहार लोग हैं और सदाबहार जिंदगी जीते हैं। कहा जा सकता है, इसमें विज्ञान का क्या दोष है? वास्तव में विज्ञान का दोष नहीं है। दोष उनका है जो विज्ञान और टेक्नोलॉजी पर कब्जा किए हुए हैं। ऐसा नहीं है कि विज्ञान इस वर्ग के लिए वरदान है और बाकी लोगों के लिए अभिशाप है। वह सभी के लिए वरदान हो सकता है, अगर सभी में उसका उपयोग करने की आर्थिक क्षमता हो जाए। विज्ञान भी आदमी ने ही बनाया है और आर्थिक विषमता भी आदमी ने ही पैदा की है। स्पष्ट है कि जिसे मानवता के लिए वरदान कहा जा सकता है, वह सभी के लिए वरदान नहीं बन पाया है। जैसे धर्म पर कु छ लोगों ने कब्जा कर रखा था, वैसे ही विज्ञान पर भी कु छ लोगों ने कब्जा कर रखा है। इसलिए कहा जा सकता है कि जो भी अच्छी चीजें हैं, वे सम्पूर्ण मानवता के लिए नहीं हैं। भारत के 99 प्रतिशत लोगों ने अभी तक प्लेन से सफर नहीं किया होगा। 50 प्रतिशत लोग ट्रेन में नहीं चढ़े होंगे। इससे भी ज्यादा लोग प्राइवेट कार में नहीं बैठे होंगे। क्या यह नारा लगाया जा सकता है कि हर उस नई सुविधा को बंद करो जो देश के अधिकांश लोगों की पहुंच के बाहर है! या तो विज्ञान को मुक्त करो या उसे तब तक स्थगित रखो जब तक उसे मुक्त कराने की स्थितियां न बन जाएं। क्या विज्ञान को विशिष्ट लोगों के चंगुल से कभी मुक्त कराया जा सकेगा? सम्पन्न देशों ने ऐसा कर दिखाया है क्योंकि उनकी आबादी कम है और उनके पास पैसा ज्यादा है। उनकी तुलना हम अपने देश से करें, तो हमारे हाथों से तोते उड़ जाएंगे। कल्पना कीजिए कि देश के हर आदमी को एअरकंडीशनर और हीटर मुहैया किया जाए, सबको चलने के लिए मोटरकार दी जाए, दूर की और जल्दी यात्रा करनी हो तो हवाई जहाज से यात्रा करने की सुविधा उपलब्ध कराई जाए, रहने के लिए सीमेंट या कंक्रीट के मकान बनाए जाएं, हर घर में प्लाज्मा टेलीविजन हो आदि- आदि। तब कितने सीमेंट, फाइबर आदि जैसे भौतिक संसाधनों की जरूरत होगी? यह भी मान लीजिए कि देश की आबादी डेढ़ अरब पर जा कर स्थिर हो जाती है, तब भी विज्ञान और टेक्नोलॉजी द्वारा प्रदत्त आधुनिकतम सुविधाओं को हर आदमी तक पहुंचाना क्या भारत के उपलब्ध संसाधनों की क्षमता के दायरे में आ सकता है? 50-100 साल के बाद भी आ सकेगा? क्या देश में कभी इतनी बिजली पैदा की जा सकती है जिससे पूरी आबादी इसका लाभ प्राप्त कर सके? अगर नहीं, अगर यह असम्भव है, तो हम जिसे विकास और उन्नति कह रहे हैं, वह क्या है? किसके लिए है? क्या यह विचार का विषय नहीं है? क्या यह भी विचार का विषय नहीं है कि जिसे भ्रष्टाचार कहते हैं, वह देश के सीमित संसाधनों में लूट का अपना हिस्सा सुनिश्चित करने के लिए वह अनिवार्य हो उठता है?
Wednesday, April 6, 2011
Friday, April 1, 2011
Monday, March 14, 2011
सस्ती और भरोसमंद अंतरिक्षयात्रा के लिए बन रहे स्पेसप्लेन
वैज्ञानिकों ने जारी किए दुबारा इस्ते माल किए जा सकने वाले एकदम नए किस्म के स्पेसप्लेन के चित्र
हाल ही में नासा के शटल यान डिस्कवरी ने आखिरी बार अपनी अंतरिक्ष यात्रा पूरी की। इसी के साथ उसका 27 वर्षो का शानदार सफर समाप्त हो गया। डिस्कवरी समेत इस साल नासा इंडेवर और अटलांटिस नामक शटल यानों को भी रिटायर कर रहा है। इसी के साथ शटल यानों के एक युग का समापन हो जाएगा। उपग्रहों और वेधशालाओं (जैसे कि हबल) और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक तमाम साजोसामान,अनुसंधान सामग्री और अंतरिक्षयात्रियों को ले जाने-लाने में इन शटल यानों की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका रही है। नासा के बेड़े में अब केवल दो शटल यान ही सक्रिय भूमिका निभाएंगे जो कि अंतरिक्षीय गतिविधियों को जारी रखने के लिए काफी नहीं होंगे। इसी के मद्देनजर पिछले दिनों ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने दुबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले एकदम नए किस्म के स्पेसप्लेन के चित्रों को जारी किया है। उनका कहना है कि ये न सिर्फ शटल यानों से बेहतर होंगे बल्कि अंतरिक्ष पर्यटन को नई ऊंचाइयों पर भी पहुंचाएंगे। स्काईलोन नामक ये यान बिना पायलट के होंगे। इनका निर्माण ब्रिटेन की रिएक्शन इंजन्स कर रही है। ये यान आने वाले वर्षो में बाह्य अंतरिक्ष में सस्ती और विश्वसनीय यात्रा सुलभ कराएंगे। इंजीनियरों को उम्मीद है कि स्काईलोन कुछ ही वर्षो में डिस्कवरी की जगह ले लेगा। नए विकसित किए जा रहे अंतरिक्षयान परंपरागत शटल यानों से एकदम भिन्न और लंबे होंगे। इनकी लंबाई 90 मीटर होगी। इसका इंजन हाइड़ोजन ईधन से संचालित होगा जिसका डिजाइन कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर एलन बांड ने किया है। शुरुआत में इसका मुख्य उद्देश्य उपग्रहों को अंतरिक्ष में लांच करना था लेकिन अब इसे इस तरह से डिजाइन किया जा रहा है कि यह 30 से 40 यात्रियों को भी साथ ले जाएगा। इसके साथ ही यह अंतरिक्ष पर्यटन में नए युग के द्वार खोल देगा। कंपनी के विशेषज्ञों के मुताबिक इसका निर्माण अभी शुरुआती दौर में है और सामान्य ब्रिटिश नागरिकों को इसकी यात्रा करने के लिए अभी 10 साल और इंतजार करना होगा। रिएक्शन इंजन्स लिमिटेड के प्रोग्राम डायरेक्टर के अनुसार, इसका इंजन हवा के साथ हाइड्रोजन जलाकर शुरू होता है और द्रव ऑक्सीजन के साथ हाइड्रोजन जलाने के साथ बंद होता है, जैसा कि शटल इंजन में होता है। यही वह वजह है जो नासा तथा यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के यानों को पीछे छोड़ देता है क्योंकि उन्हें कक्षा में आगे बढ़ने के लिए डिस्पोजेबल और महंगे ईधन की जरूरत होती है। स्काईलोन के निर्माण पर करीब छह अरब पौंड की लागत आएगी।
Monday, March 7, 2011
नासा के वैज्ञानिक ने किया दूसरे ग्रह का प्राणी खोजने का दावा
पृथ्वी के दूरस्थ इलाकों में गिरे उल्कापिंडों में मिले छोटे-से जीवाश्मीकृत बैक्टीरिया के 10 वर्षो के अध्ययन के बाद किया गया खु लासा दुनिया के 5000 वैज्ञानिकों और 100 विशेषज्ञों को इस शोध का विश्लेषण करने के लिए किया गया है आमंत्रित
लंदन। नासा के एक वैज्ञानिक का दावा है कि उसने परग्रही जीवन यानी एलियन का पता लगा लिया है और इस खोज से मालूम किया जा सकता है कि पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत कैसे हुई। इस तरह का असाधारण दावा किया है डॉ. र्रिचड हूवर ने जो कि नासा के मार्शल स्पेस फ्लाइट सेंटर में एस्ट्रोबायोलॉजिस्ट हैं। डॉ. र्रिचड हूवर ने यह खुलासा पृथ्वी के दूरस्थ इलाकों में गिरे उल्कापिंडों में मिले छोटे-से जीवाश्मीकृत बैक्टीरिया के 10 वर्षो के अध्ययन के बाद किया। डॉ.हूवर ने चुनौती देते हुए घोषणा की है कि दुनिया का कोई भी बैज्ञानिक इसकी जांच करे और उसे गलत साबित करके दिखाए। उन्होंने बताया कि अंटार्कटिका, साइबेरिया और अलास्का की यात्रा के दौरान उन्होंने अत्यंत दुर्लभ उल्कापिंड ‘सीआई1 काबरेनेशियस कोन्ड्राइट्स’ का अध्ययन किया। समझा जाता है कि पृथ्वी पर ऐसे केवल नौ उल्कापिंड ही हैं। उन्होंने कहा ‘ऐसा संकेत मिलता है कि जीवन केवल पृथ्वी तक ही सीमित नहीं है।’
शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शी से जीवाश्म की जांच-परख करने वाले डॉ. हूवर ने कहा, ‘मैंने अब तक बैक्टीरिया के तरह-तरह के जीवाश्म देखे हैं। इनमें से कई ऐसे हैं जो पृथ्वी पर पाए जाने वाली प्रजातियों से बेहद मिलते- जुलते हैं लेकिन कुछ एकदम अलग, यानी जो इस दुनिया के हैं ही नहीं।’ डॉ. हूबर का का कहना है कि ब्रह्मांड में जीवन के बीज उल्कापिंडों के जरिए फैलते होंगे और पृथ्वी पर जीवन किसी क्षुद्रग्रह के टकराने के दौरान किसी बैक्टीरिया के माध्यम से ही आया होगा। उन्होंने ‘फॉक्स न्यूज’ से कहा ‘कुछ ऐसे बैक्टीरिया भी हैं जो बिल्कुल अलग हैं और उनकी तरह नहीं दिखते जिन्हें हम पहचान सकते हैं। मैंने उन्हें कई अन्य विशेषज्ञों को दिखाया और उनकी राय भी ऐसी ही थी।’ डॉ. हूवर प्रत्येक उल्कापिंड के पत्थर संग्रह कर उन्हें प्रयोगशाला में ले जाते हैं और वहां तोड़ कर उनके जीवाश्मों का अध्ययन करते हैं। इसी सिलसिले में स्कैनिंग करते हुए उन्होंने एक जैविक अवशेष पाया जिसमें नाइट्रोजन नहीं थी। अब तक माना जाता है कि सभी जीवित प्राणियों में नाइट्रोजन पाई जाती है। यह शोध कॉस्मोलॉजी जर्नल के मार्च संस्करण में प्रकाशित हुआ है जिसने दुनिया के 5000 वैज्ञानिकों और 100 विशेषज्ञों को इस शोध का विश्लेषण करने के लिए आमंत्रित किया है।
Friday, March 4, 2011
सूर्य के लापता धब्बों की वजह का पता चला
दुनिया भर के सौर वैज्ञानिक वर्ष 2008-09 के दौरान सूर्य के धब्बों के लापता होने से चकित थे ‘सूर्य के भीतर मौजूद प्लाज्मा की धाराओं ने सूर्य के धब्बों के निर्माण में हस्तक्षेप किया और सौर न्यूनता को बढ़ाया।
भारत के शीर्ष वैज्ञानिक संगठन और नासा द्वारा प्रायोजित एक संयुक्त अनुसंधान और कोलकाता के एक वैज्ञानिक ने सूर्य के 11 वर्षीय चक्र के दौरान सौर गतिविधियों में कमी आने की पहेली को हल कर लिया है। दुनिया भर के सौर वैज्ञानिक वर्ष 2008-09 के दौरान सूर्य के धब्बों के लापता होने से चकित थे। पिछले 100 सालों के दौरान यह सर्वाधिक न्यूनतम सौर गतिविधि थी। न्यूनतम सौर गतिविधि के दौरान सूर्य के धब्बों और सौर अंधड़ों की आवृत्ति काफी कम हो जाती है। नासा के एक बयान के अनुसार, सौर गतिविधियों की इस न्यूनता का असर अंतरिक्ष यात्रा की सुरक्षा और हमारे ग्रह द्वारा इकट्ठा किए जाने वाले कक्षीय कचरे की मात्रा पर पड़ता है। भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, कोलकाता के प्रमुख लेखक दिव्येन्दु नंदी ने कहा, ‘सूर्य के भीतर मौजूद प्लाज्मा की धाराओं ने सूर्य के धब्बों के निर्माण में हस्तक्षेप किया और सौर न्यूनता को बढ़ाया।’
नासा के ‘लिविंग विद अ स्टार’ कार्यक्र म और भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा वित्तपोषित इस अनुसंधान से पता चला है कि इस सौर न्यूनता की अवधि में सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र कमजोर हो जाता है जिसके कारण रिकार्ड संख्या में अंतरिक्षीय किरणों सौर पण्राली में प्रवेश कर जाती हैं। इसके चलते अंतरिक्ष की यात्रा जोखिमपूर्ण हो जाती है। इसमें कहा गया है, इसके साथ ही पराबैंगनी किरणों में कमी के कारण पृथ्वी की ऊपरी सतह ठंडी होकर ध्वस्त हो गई। नासा के विज्ञान मिशन निदेशालय में हिलियोफिजिक्स डिवीजन के निदेशक र्रिचड फिशर ने कहा, ‘इस अनुसंधान से यह प्रदर्शित होता है कि हिलियोफिजिक्स सिस्टम आब्जव्रेटरी मिशन के प्रेक्षण किस प्रकार नए सिद्धांतों और विकसित तकनीकों को प्रोत्साहित करते हैं।’ सौर चक्र या सौर चुंबकीय गतिविधि चक्र सूर्य से निकलने वाली प्रदीप्ति है जिसका अनुभव पृथ्वी पर होता है।
बाहरी अंतरिक्ष से आया पृथ्वी पर जीवन !
वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका में 1995 में पाए गए उल्कापिंड में नाइट्रोजन के ‘निर्माण तत्व’ का पता लगाया है। इससे एक बार इस सिद्धांत की पुष्टि हुई है कि पृथ्वी पर जीवन बाहरी अंतरिक्ष से आया है। परीक्षणों ने यह प्रदर्शित किया है कि इस चट्टान में अमोनिया है जो आंशिक तौर पर नाइट्रोजन से बनी है और इसमें डीएनए और प्रोटीन है जो जीवन के निर्माण तत्व हैं। द डेली मेल के अनुसार, इससे इस सिद्धांत की पुष्टि हुई है कि पृथ्वी पर जीव किसी अन्य स्थान से आया था। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रारंभिक जीवन के विकास के लिए आवश्यक आधारभूत परमाणुओं को मुहैया करा पाने में पृथ्वी सक्षम नहीं थी। हाल के प्रयोगों में एरिजोना विश्वविद्यालय के अनुसंधानियों के दल ने उल्का से निकाली गई चार ग्राम चट्टान पर प्रयोग किए। इस चट्टान का नाम नुनाताक्स 95229 था। यह उल्का अंटार्कटिका में 1995 में पाई गई थी। वैज्ञानिकों ने पाया कि उल्का में बड़ी मात्रा में हाइड्रोकार्बन थे और साथ ही अमोनिया भी काफी मात्रा में मौजूद थी।
Monday, February 21, 2011
Thursday, February 10, 2011
दिमाग को बुढ़ापे से बचाने पर काम शुरू
मस्तिष्क एक-दूसरे से गहराई से जुड़े एक छोटे से वि नेटवर्क के रूप में है न कि अलग-अलग क्षेत्रों के संग्रह के रूप में
वाशिंगटन (एजेंसी)। वैज्ञानिकों की एक टीम ने पाया है कि मानव मस्तिष्क के काम करने की गति को सही बनाये रखने के लिए संयोजन प्रक्रि या काफी अहम है और बुढ़ापे के साथ इस प्रक्रि या में गिरावट आने लगती है। इस खोज के साथ ही बुढ़ापे में मस्तिष्क में होने वाले इस क्षय के उपचार की उम्मीदें बढ़ गई हैं। न्यू साउथ वेल्स के भारतीय मूल के वैज्ञानिक परमिंदर सचदेव और उनके सहकर्मियों ने पाया कि मस्तिष्क एक-दूसरे से गहराई से जुड़े एक छोटे से वि नेटवर्क के रूप में है न कि अलग-अलग क्षेत्रों के संग्रह के रूप में, जैसा कि पहले माना जाता था। पत्रिका ‘न्यूरो साइंस’ ने खबर दी है कि वैज्ञानिकों ने अपने अनुसंधान में मानव मस्तिष्क के नाड़ी तंत्र का नक्शा लिया और इससे होने वाले सूचना संचार तथा भाषा जैसे विशिष्ट कायरे को परिभाषित किया। वे अब इस बात का पता लगा रहे हैं कि कौन से कारक इन तंत्रों की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। वैज्ञानिक इस उम्मीद के साथ ऐसा कर रहे हैं कि इससे बढ़ती आयु में होने वाले क्षरण को रोका जा सकेगा। ऐसे में माना जा रहा है कि आने वाले समय में इस क्षरण को रोक कर बुढ़ापे में मानसिक स्थिति को काबू किया जा सकेगा। प्रोफेसर सचदेव ने कहा कि मस्तिष्क के खास हिस्से विशेष कायरे के लिए महत्वपूर्ण हैं लेकिन साथ ही मस्तिष्क के विभिन्न हिस्सों में आपसी और एक हिस्से से दूसरे हिस्से के बीच सूचना का संचार भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। हम सब जानते हैं कि जब सड़क या फोन नेटवर्क अवरुद्ध हो जाता है तो क्या होता है। बिल्कुल ऐसा ही मस्तिष्क के मामले में होता है। उन्होंने कहा कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ मस्तिष्क के नेटवर्क की क्षमता में गिरावट आने लगती है। इससे मस्तिष्क में सूचना संचार की गति धीमी पड़ जाती है जो अन्य संज्ञानात्मक पण्राली को प्रभावित कर सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि नई एमआरआई प्रौद्योगिकी के आगमन और आकलन क्षमता ने तंत्रिका समूह के बेहतर नक्शे लेने में मदद की है। इसके फलस्वरूप वैज्ञानिक दिमाग का अध्ययन सही ढंग से कर सकते हैं। सचदेव ने कहा कि पहले मस्तिष्क का अध्ययन करते समय विशेष क्षेत्रों में पाए जाने वाले स्लेटी हिस्से पर ध्यान केंद्रित किया जाता था क्योंकि अध्ययन करने वालोें का मानना था कि यह वह हिस्सा है जहां गतिविधि होती है। सफेद हिस्से पर ध्यान नहीं दिया जाता था। लेकिन यह वह पदार्थ है जो मस्तिष्क के एक क्षेत्र को दूसरे से जोड़ता है और इस जुड़ाव के बिना स्लेटी पदार्थ बेकार है। वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में 342 स्वस्थ लोगों का एमआरआई किया जिनकी उम्र 72 से 92 साल के बीच थी। इसके लिए उन्होंने नक्शे लेने की नई तकनीक ‘डिफ्यूजन टेंसर इमेजिंग’ (डीटीआई) का इस्तेमाल किया। वैज्ञानिक शोधों के लिए हो अनुकूल माहौल
विज्ञान संबंधी शोध के क्षेत्र में अग्रणी होने के बावजूद भारत अंतरराष्ट्रीय मान्यता या श्रेय पाने में पिछड़ क्यों जाता है। यह विचारणीय मुद्दा है। पिछले वर्ष टेस्ट ट्यूब बेबी की सफलता में मेडिसिन का नोबल पुरस्कार 32 वर्ष बाद डॉ. राबर्ट जी एडर्वड और पेट्रिक स्टेपटो को दिया गया। जुलाई 1978 में इनके प्रयासों से आईवीएफ लुईस दुनिया में आई थी। भारतीय डॉक्टर सुभाष मुखोपाध्याय ने लुईस के जन्म के तीन महीने बाद ही दुनिया की दूसरी टेस्ट ट्यूब बेबी दुर्गा को जन्म दिलवाया पर दुर्भाग्य से उनके कार्य की प्रशंसा के बजाय तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा उनके अनुसंधान को प्रकाशित होने से न सिर्फ रोका गया बल्कि तंग होकर 1981 में वह आत्महत्या करने पर मजबूर हो गये। आखिर में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने 2005 में उनके काम को मान्यता दी। पर यह सब इतनी देर से हुआ कि डॉ. मुखोपाध्याय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के सम्मान को भी ठेस लगी। इसी तरह मार्कोनी को टेलीग्राफ की खोज के लिए दुनिया ने सराहा, जबकि कहा जाता है कि जगदीशचंद्र बसु इस पर पहले ही अनुसंधान कर चुके थे। माना कि गुलामी के दौर में भारतीयों के शोधों को अंग्रेज महत्व नहीं देते थे लेकिन दुर्भाग्य से आजादी के बाद भी अनेक वैज्ञानिक उपलब्धियों को वरीयता नहीं दी जाती। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कई कनिष्ठ वैज्ञानिकों की आत्महत्या की खबरें जब-तब आती रही हैं। आरोप लगते रहे हैं कि उनकी उपलब्धि का श्रेय उनके वरिष्ठ स्वयं लेने की कोशिश करते हैं। हमारे शोध संस्थानों में ऐसी स्थितियां अब भी बनी हुई हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में नये-नये अनुसंधान होने चाहिए लेकिन अव्यवस्था और नौकरशाही के दबाव में यह संस्थान कुछ भी करने में अपने को उतना सक्षम नहीं पा रहा है। कुछ वर्षों पहले एक विश्वसनीय सूत्र ने बताया था कि संस्थान में अत्याधुनिक मशीनें चलाने वाले ही नहीं थे। ऐसे अनेक चिकित्सक जो अब संस्थान छोड़ चुके हैं और निजी चिकित्सा संस्थानों में अपनी सेवायें देने के साथ सफल शोध कर रहे हैं इसका खुलासा करते हैं। इनमें एक डॉ. जीसी तलवार जो नेशनल इंस्टीट्यूट आफ इम्यूनोलॉजी के संस्थापक हैं का दावा है कि विगत में उन्होंने दो टीकों की खोज की थी पर उनके विभागाध्यक्ष ने उस शोध को रोकने की पूरी कोशिश की। डा. तलवार याद करते हैं कि 1956 में जब एआईआईएमएस खुला था तो उनकी नियुक्ति ऐसोसिएट प्रोफेसर के रूप में हुई थी। बाद में जब प्रोफेसर के पद सृजित हुए तो डॉ. तलवार सहित संस्थान के 22 लोगों को कोई वरीयता नहीं दी गई और बाहरी लोगों को नियुक्त किया गया। वह मानते हैं जब तक किसी संस्थान में कोई गाड फादर न हो, तब तक शोधार्थी सही ढंग से शोध नहीं कर सकता। 1970 में जब वह कुष्ठ रोग के टीके का क्लिनिकल ट्रायल कर रहे थे तब भी उन्हें भारी अवरोधों का सामना करना पड़ा था और इससे वह कार्य तीन वर्ष पीछे हो गया। डॉ. तलवार ने जनसंख्या नियंतण्रके टीके का ईजाद किया तो उस पर भी विवाद हुआ। कहा गया कि एंटी एचसीजी टीका महिलाओं को बांझ बना देता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जब डॉ. तलवार के शोधपत्र पर जनसंख्या परिषद के निदेशक डॉ शेल्डन का ध्यान गया तो भारत सरकार के तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. कर्ण सिंह को इसकी जानकारी दी गई। बाधाओं के बावजूद 1980 में इस टीके का पेटेंटीकरण हुआ। तलवार को कनाडा और राकफेलर संस्थान से आर्थिक सहायता मिली। यह भी आरोप है कि अक्सर शोध पर वरिष्ठ सदस्य अपना नाम पहले रखवाने का दबाव डालते हैं। जबकि शोध पत्र कनिष्ठ सहयोगी द्वारा तैयार किया गया होता है। जबकि विदेशों के मेडिकल जनरल में शोध पत्र तैयार करने वाले का नाम पहले और निरीक्षक का बाद में छपता है। भारत में यह प्रक्रिया एकदम उल्टी है। डा. अनूप मिश्रा जो अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के मेडिसिन विभाग में 30 वर्षों तक प्रोफेसर रहे, का भी आरोप है कि उनके कनिष्ठ सहयोगियों को एचआईवी पर शोध करने की अनुमति नहीं दी गई। यहां तक कि रोगी के रजिस्ट्रेशन, उसका नाम, पता और फोन नंबर आदि विभागाध्यक्ष किसी को नहीं बताते। यानी अफसरशाही शोध कायरें में बाधा पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ती। उनका अनुभव है कि अनुसंधान में काम आने वाले छोटे से छोटे उपकरण के लिए कई चैनलों से हो कर गुजरना पड़ता है। जबकि निजी संस्थानों में जैसे ही एथिक्स पैनल शोध पत्र को स्वीकृति देता है, एक महीने के भीतर शोध कार्य शुरू हो जाता है। वैज्ञानिक प्रगति के निमित्त आज हमें इन कमियों को दूर करने की आवश्यकता है, तभी ब्रेन ड्रेन को रोक सकते हैं। जरूरी नहीं कि यह ब्रेन देश से बाहर जाए। क्योंकि आज के समय में उसकी प्रतिभा का उपयोग कोई भी देश कहीं भी बैठ कर अपने हित में कर सकता है। वैज्ञानिकों के लिए शोध का अनुकूल माहौल होना चाहिए। नहीं तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां देश के अनुसंधानों का पेटेंट अपने नाम करवाती जाएंगी। और हमें इनका कोई श्रेय नहीं मिल पाएगा।
Sunday, January 23, 2011
पृथ्वी को मिलेगा दूसरा सूरज
करोड़ों-अरबों लोगों को अपनी गोद में पनाह देने वाली इस पृथ्वी को जल्द ही एक दूसरा सूरज नसीब होने वाला है। जी हां, चौंकिए मत..। वैज्ञानिकों की मानें तो अंधेरे आसमान में सर्वाधिक चमकीले तारों में से एक तारा जब धमाके से सुपरनोवा में तब्दील होगा तो जल्द ही हमारी धरती को एक दूसरा सूरज नसीब होगा। इस साल की शुरुआत में ही धरती को दूसरे सूरज का साथ मिलने की संभावना है। दोनों का साथ कम से कम एक या दो हफ्ते का होगा। धरती को दूसरा सूरज नसीब होने का यह वाकया इस ग्रह के इतिहास में सबसे जबर्दस्त लाइट शो साबित हो सकता है। खगोल वैज्ञानिकों के मुताबिक, पृथ्वी को निश्चित तौर पर इसका फायदा मिलेगा जब अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव में पहुंच चुका तारा ‘बेतेलजियूज’ हमेशा के िल्ा ए खत्म होने की स्थिति में आएगा। यह धमाका इतना चमकदार होगा कि 640 प्रकाश वर्ष दूर ‘ओरियन’ तारामंडल में तारे के मौजूद होने के बावजूद यह रात को दिन में बदल डालेगा और कुछ हफ्ते तक ऐसा लगेगा कि आसमान में दो सूरज हैं। असल बहस का मुद्दा तो यह है कि आखिर यह होगा कब ? यदि नक्षत्रों की भाषा में समझें तो ‘बेतेलजियूज’ के दुर्घटनाग्रस्त होने और बहुत निकट भविष्य में जल जाने का अंदेशा है। ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ साउदर्न क्वींसलैंड के ब्रैड कार्टर ने दावा किया कि आकाशगंगा से जुड़ा धमाका 2012 से पहले हो सकता है या फिर अगले लाखों वर्षों में कभी भी हो सकता है। कार्टर ने बताया कि यह उम्रदराज सितारा अपने केंद्र में धीरे-धीरे ऊर्जा खोता जा रहा है। ऊर्जा से ‘बेतेलजियूज’ दमकता रहता है और मजबूत भी बना रहता है। ऊर्जा की कमी की वजह से सितारा खुद ही खत्म हो जाएगा और यह बहुत तेजी से होगा।
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