ध्यान से देखें कि आपने आज जो राशिफल अखबार में पढ़ा है क्या वह वाकई आपका है? अंतरिक्ष में राशियों की स्थिति कोई दो हजार पूर्व निर्धारित की गई थी। खगोलविदों का दावा है कि राशियों की स्थिति अंतरिक्ष में इन वर्षो में बदल चुकी हैं। इन दावों से पाश्चात्य ज्योतिष प्रभावित हो सकता है क्योंकि वह सूर्य की स्थिति से राशियों की गणना करता है। न्यूयॉर्क के हैडन प्लेनेटोरियम के व्याख्याता जो राव के अनुसार पाश्चात्य ज्योतिष सूर्य को केंद्रीय और स्थिर मानता है, जबकि खगोलविज्ञान के अनुसार संपूर्ण अंतरिक्ष गतिमान है। राव के अनुसार राशियों की स्थिति में बदलाव पृथ्वी के समय के साथ अपनी धुरी पर झुकने के कारण आया है। यह झुकाव चंद्रमा के पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की ओर आकर्षित होने से पैदा हुआ है। राशियों में परिवर्तन की बात पिछले सप्ताह उस समय चर्चा में आई जब मिनिसोटा प्लेनेटोरियम सोसायटी के सदस्य पार्क कुंकल ने एक अखबार को दिए साक्षात्कार में राशियों की तिथियों और अंतरिक्ष में राशियों की स्थिति में भिन्नता का मुद्दा उठाया। राव ने कहा, कैलेंडर में राशि और अंतरिक्ष में राशियों की स्थिति में फर्क की पहचान सबसे पहले ईसा पूर्व 280 में एरिस्टारकस ने की थी। उनका कहना है कि पृथ्वी की स्थिति परिवर्तनशील है इसलिए रात्रि में आकाश की स्थिति भी हमें बदली हुई दिखती है। अपनी धुरी पर घूमती हुई पृथ्वी का केंद्र लगातार अपनी दिशा बदलता है। राव ने कहा, हम धु्रव तारे (पोलरिस) का उदाहरण ले सकते हैं। हमारे उत्तरी ध्रुव के सबसे नजदीक यही है। लेकिन जिस काल मे मिस्र के पिरामिड बन रहे थे, तब थुबान नामक तारा ध्रुव के सबसे नजदीक था। 12 हजार साल में पोलरिस की जगह वेगा ले लेगा। अंतरिक्ष में सब कुछ गतिमान है। वैसे खगोलविज्ञानियों का दावा है कि राशियों का मनुष्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
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Sunday, January 16, 2011
इलेक्ट्रिक शूज दौड़ेंगे 24 किमी प्रति घंटा
हेनान प्रांत के झाओ ज्यूक्विन नामक एक चीनी नागरिक ने ऐसे इलेक्ट्रिक शूज निर्मित किए हैं जिन्हें पहनकर आप एक बार में 160 किमी तक सफर तय कर सकते हैं। बैटरी से चालित ये शूज स्केट्स की तरह हैं, जिसमें हेडलाइट के अलावा इंडीकेटर, ब्रेक्स व बे्रक लाइट जैसे सभी फीचर मौजूद हैं और शूज पर लगे हैंडल की मदद से आप इसे जिस दिशा में मोड़ना चाहेंगे, उस ओर आसानी से मोड़ सकेंगे। इन शूज को पहनने केबाद चलने की जहमत भी नहीं उठानी होगी, क्योंकि एक इशारे पर शूज आपको जहां चाहेंगे, ले जाऐंगे। इस शूज को 24 किमी प्रति घंटे तक की गति से दौड़ाया जा सकेगा। इन जूते विशेष तौर पर ग्रामीण इलाकों के बच्चों के लिए बनाए गए हैं, क्योंकि बच्चों को स्कूल जाने के लिए कई मील पैदल चलना पड़ता है। इस शूज को तैयार करने में करीब 4 वर्ष लगे।
34 हजार साल पुराना बैक्टीरिया जिंदा
वैज्ञानिकों ने 34 हजार साल पुराना जीवित बैक्टीरिया ढूंढ निकाला है। यह बैक्टीरिया पृथ्वी का सबसे पुराना और उम्रदराज जीव है। वैज्ञानिकों को यह बैक्टीरिया कैलीफोर्निया की डैथ वैली में पाए गए नमक कणों में मिला। अमेरिकी पत्रिका जीएसए टुडे के जनवरी 2011 अंक में यह जानकारी दी गई है। इस प्राचीनतम बैक्टीरिया की खोज करने वाले वैज्ञानिक ब्रायन शूबर्ट ने कहा, वाकई यह मेरे लिए सबसे बड़ा आश्चर्य है। ये बैक्टीरिया नमक कणों के भीतर बने बुलबुलों की नमी में जिंदा थे। उल्लेखनीय है कि सॉल्ट क्रिस्टल बहुत तेजी से बनते हैं और उनके भीतर जो भी पदार्थ या जीव होता है, वह कैद होकर रह जाता है। शूबर्ट के सहायक और बिंघमटन यूनिवर्सिटी के जियोलॉजी विभाग के टिम लोएंसटिन के अनुसार, ये बैक्टीरिया हमेशा के लिए नमक कणों में कैद हो गए, जैसे कोई टाइम कैप्सूल में बंद हो जाए। शूबर्ट ने बताया कि ये बैक्टीरिया सदियों से जीवित थे, लेकिन बिना हिला-ढुले। वे जीने के लिए किसी ऊर्जा का प्रयोग नहीं कर रहे। वे न तरल अवस्था में तैर रहे थे और न अपनी संतति उत्पन्न कर रहे थे। वे सिवा अपने अस्तित्व को बनाए रखने के कुछ नहीं कर रहे थे। खास बात यह है कि शूबर्ट ने इन बैक्टीरिया को प्रयोगशाला में जीवित रूप में विकसित करने में कामयाबी हासिल की। जबकि एक दशक पहले कुछ वैज्ञानिकों ने दो खरब 50 अरब साल पुराने जीवित बैक्टीरिया खोजने का दावा किया था, लेकिन वे उनसे नई उत्पत्ति नहीं कर सके थे। अत: उन्हें मृत माना गया। शूबर्ट ने अपनी प्रयोगशाला के अतिरिक्त अन्य प्रयोगशालाओं में भी अपने द्वारा खोजे गए जीवों को भेजा, जिन्हें वहां भी जीव रूप में विकसित किया जा सका। शूबर्ट ने बताया कि उनके द्वारा खोजे गए बैक्टीरिया ने जागने में ढाई महीने के समय लिया और उसके बाद अपनी संतति बढ़ाई। यद्यपि शूबर्ट ने 900 बैक्टीरिया सैंपलों को इकट्ठा किया था, लेकिन उनमें से मात्र पांच में ही जीवन चक्र आगे विकसित हुआ।
खोजपरक विज्ञान की खोज
नवरत्न विश्वविद्यालयों की अवधारणा पर लेखक की टिप्पणी
पिछले दिनों चेन्नइ में संपन्न भारतीय विज्ञान कांग्रेस के 98वें अधिवेशन में मुख्य फोकस भारतीय विश्वविद्यालयों में विज्ञान शिक्षा की उच्च गुणवत्ता और वैज्ञानिक अनुसंधान में उत्कृष्टता पर था। उम्मीद की जानी चाहिए कि हमारे राजनेता इस थीम को ध्यान में रखकर विज्ञान के क्षेत्र में साहसिक पहल करेंगे। भारतीय विश्वविद्यालयों में विज्ञान शिक्षा वैश्विक मानकों की दृष्टि से बहुत पीछे है और यही बात वैज्ञानिक अनुसंधान पर भी लागू होती है। इन क्षेत्रों में पिछड़ने के कारण आज हमें सक्षम तकनीकी कर्मचारियों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। स्पष्ट नियमों और निगरानी के अभाव में प्राइवेट और विदेशी संस्थानों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन शिक्षा का स्तर अपेक्षित मानदंडों के अनुरूप न होने के कारण अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं। मजबूरन सरकार को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उत्कृष्ट शिक्षा मुहैया कराने के लिए आगे आना पड़ रहा है। सरकार इस कार्य में तभी सफल हो सकती है, जब वह मानव संसाधनों का विस्तार करे और शैक्षणिक स्तर में वृद्धि करे। नए विश्वविद्यालय की बात सुनने में अच्छी बात है, लेकिन हमारा मुख्य जोर मौजूदा विश्वविद्यालयों में इंफ्रास्ट्रक्चर, वित्तीय स्थिति और उनकी स्वायत्तता को मजबूत करने पर होना चाहिए ताकि अनुसंधान और शिक्षा के माहौल को उत्कृष्ट नतीजे देने के काबिल बनाया जा सके। आजकल हमारे नीति निर्धारक और टेक्नोक्रेट इनोवेशन या नए आविष्कारों पर बहुत जोर देते हैं। इनोवेशन को खरीदा या थोपा नहीं जा सकता। यह तभी हासिल हो सकता है, जब उच्च शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थानों में रिसर्च और शिक्षा के लिए उचित माहौल तैयार किया जाए। विश्वविद्यालयों को आकर्षक नाम देने मात्र से ही इनोवेशन प्राप्त नहीं किया जा सकता। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने विज्ञान अधिवेशन में ऐलान किया कि सरकार नवरत्न विश्वविद्यालयों की अवधारणा पर विचार कर रही है। इसके अलावा सरकार 12 इनोवेशन विश्वविद्यालय भी स्थापित करना चाहती है, जो शिक्षा के क्षेत्र मे उच्च मानदंड कायम करेंगे और दुनिया के सर्वोत्तम संस्थानों के साथ प्रतिस्पर्धा करेंगे। कहा जा रहा है कि देश में गरीबी, भुखमरी, बीमारियों और जल संकट जैसी समस्याओं से निपटने के लिए इनोवेशन विश्वविद्यालय विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में अपने उत्कृष्ट नतीजों के द्वारा महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं। लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि इस तरह के आकर्षक नाम वाले विश्वविद्यालय शैक्षणिक उत्कृष्टता और रचनात्मकता देने में कामयाब होंगे। कुछ विशेषज्ञों ने सरकार द्वारा एकेडमी ऑफ साइंटिफिक एंड इनोवेटिव रिसर्च के स्थापित किए जाने के प्रस्ताव को गलत ठहराया है। यह अकादमी केंद्रीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के सहयोग से स्थापित होगी। मोटे तौर पर यह पीएचडी और पोस्ट डॉक्टरल फेलो तैयार करेगी। हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती विश्वविद्यालयों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी को ऊंचे स्तर पर ले जाने की है। यदि हमने सीएसआईआर को प्रौद्योगिकी विकसित करने के उसके मूल उद्देश्य से भटका कर उसे मानव संसाधन विकसित करने के काम पर लगा दिया तो इससे विश्वविद्यालयों का बड़ा अहित होगा। यह सही है कि भारतीय साइंस को आज इनोवेशन की तलाश है, यह उसकी जरूरत भी है। लेकिन यह इनोवेशन सिर्फ सरकार की इनोवेटिव घोषणाओं से ही हासिल नहीं किया जा सकता। इसे सुविचारित नीतियों, सही प्राथमिकताओं और दीर्घकालिक प्रयासों से ही हासिल किया जा सकता है। इसमें सरकार के साथ-साथ वैज्ञानिक समुदाय की भूमिका भी अहम होगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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