कम संसाधनों और कम बजट के बावजूद भारत आज अंतरिक्ष में कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। इस साल भारत अंतरिक्ष में दो उपग्रह छोड़ चुका है। अंतरिक्ष अभियान के क्षेत्र में एक और मील का पत्थर स्थापित करते हुए भारत ने 15 जुलाई को स्वदेश निर्मित अत्याधुनिक संचार उपग्रह जीसैट-12 का श्रीहरिकोटा से ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान पीएसएलवी सी-17 से प्रक्षेपण करने में सफलता हासिल की है। इस प्रक्षेपण के बाद भारत के 187 ट्रांस्पोंडर हो जाएंगे। लेकिन अभी भी हम इसरो द्वारा लक्षित 2012 तक 500 ट्रांस्पोंडरों से पीछे हैं। इसके माध्यम से डीटीएच, वी सैट परिचालन के क्षेत्र में बढ़ रही मांग को पूरा करने में मदद मिलेगी। अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में हम लगातार प्रगति कर रहे हैं, लेकिन अभी भी हम पूरी तरह से आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं। गत वर्ष इसरो ने जीसैट-8 का प्रक्षेपण फ्रेंच गुयाना के अंतरिक्ष केंद्र से किया था। पर्यावरण संबधी अध्ययन के लिहाज से फ्रांस से संयुक्त उपक्रम पर विचार चल रहा है। क्रायोजेनिक तकनीकी के परिप्रेक्ष्य में पूर्ण सफलता नहीं मिलने के कारण भारत इस मामले में आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है, जबकि प्रयोगशाला स्तर पर क्रायोजेनिक इंजन का सफलतापूर्वक परीक्षण किया जा चुका है। स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन की सहायता से लांच किए गए प्रक्षेपण यान जीएसएलवी की असफलता के बाद इस पर सवालिया निशान लगा हुआ है। भारतीय प्रक्षेपण रॉकेटों की विकास लागत विदेशी प्रक्षेपण रॉकेटों की लागत की एक-तिहाई है। भारत में इनसैट प्रणाली की क्षमता को जीसैट द्वारा मजबूत बनाया जा रहा है, जिससे दूरस्थ शिक्षा, दूरस्थ चिकित्सा ही नहीं बल्कि ग्राम संसाधन केंद्र को उन्नत बनाया जा सकेगा। जीसैट 12 को इंसैट 2 ई और इनसैट 4 ए के साथ स्थापित किया जाएगा। 2002 में कल्पना के बाद पीएसएलवी के 19 प्रक्षेपण में यह दूसरा मौका है जब संचार उपग्रह छोड़ने में इसका उपयोग किया गया है। इसरो ने इस प्रक्षेपण में उच्च क्षमता के 40 विन्यासों का उपयोग किया, जिनमें छह ठोस मोटर हैं, जो 12 टन प्रणोदक ले जा रहे हैं। इसके पहले पीएसएलवी की उड़ानों के लिए नौ टन प्रणोदक ले जाने का मानक रहा है। 2010 में जीएसएलवी के दो अभियान विफल हो गए थे। जीएसएलवी एफ 06 संचार उपग्रह जीसैट-5 पी को लेकर जाने वाले इस यान में प्रक्षेपण के महज एक मिनट बाद ही विस्फोट हो गया था और यह बंगाल की खाड़ी में गिर गया था। इसी तरह जीएसएलवी-डी 3 जीसैट-4 का अभियान भी अप्रैल 2010 में विफल हो गया था। इन विफलताओं के कारण भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के आगामी कार्यक्रमों पर भले ही संदेह जताया गया हो, लेकिन इसरो के पीएसएलवी सी-16 ने 20 अप्रैल, 2011 को रिर्सोस सैट-2 एवं अन्य छोटे उपकरणों को निर्धारित कक्षाओं में ले जाकर सफलता पूर्वक स्थापित किया। रिर्सोस सैट 2 ऐसा आधुनिक सेंस्ंिाग उपग्रह है जिससे प्राकृतिक संसाधनों के अध्ययन और प्रबंधन में मदद मिलेगी। इसरो के अध्यक्ष के राधाकृष्णन ने कहा है कि भारत की अंतरिक्ष योजना भविष्य में मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन भेजने की है। लेकिन इस तरह के अभियान की सफलता सुनिश्चित करने के लिए अभी बहुत सारे परीक्षण किए जाने हैं। भारत वर्ष 2016 में नासा के चंद्र मिशन का हिस्सा बन सकता है और इसरो चंद्रमा के आगे के अध्ययन के लिए अमेरिकी जेट प्रणोदन प्रयोगशाला से साझेदारी भी कर सकता है। देश में आगामी चंद्र मिशन चंद्रयान 2 के संबंध में कार्य प्रगति पर है। चंद्रयान 2 के 2013-14 में प्रक्षेपण की संभावना है। भविष्य में अंतरिक्ष के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। कुछ साल पहले तक फ्रांस की एरियन स्पेस कंपनी की मदद से भारत अपने उपग्रह छोड़ता था। अब वह ग्राहक के बजाय साझेदारी की भूमिका पर पहुंच गया है। भारत अंतरिक्ष विज्ञान में नई सफलताएं हासिल करके विकास को गति प्रदान कर सकता है। (लेख्रक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
Showing posts with label दैनिक जागरण(राष्ट्रीय संस्करण). Show all posts
Showing posts with label दैनिक जागरण(राष्ट्रीय संस्करण). Show all posts
Wednesday, July 27, 2011
Tuesday, May 3, 2011
धरती से टकराएगा सौर तूफान!
यह कोई माया कलेंडर की भविष्यवाणी नहीं है, बल्कि ब्रह्मांड वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि वर्ष 2012 में भयंकर सौर तूफान के धरती से टकराने के कारण भारी धन और जन की क्षति हो सकती है। पिछले वर्ष अमेरिकी खगोलविदों ने 2012 में धरती से सौर तूफान के टकराने की भविष्यवाणी की थी। अब उनका आकलन है कि अभी तक इसे जितना ताकतवर समझा जा रहा था, यह उससे कहीं अधिक ज्यादा होगा। पृथ्वी से यह दस करोड़ हाइड्रोजन बमों की शक्ति से टकराएगा। इस साल के शुरुआत में इसी तूफान के चलते अंतरिक्ष में अद्भुत रोशनियां दिखाई दी थी। नासा ने चेतावनी दी है कि जो चकाचौंध उन्होंने देखी है, वह अंतरिक्ष में बन रहे भीषण सौर तूफान का एक संकेत मात्र है। इस सौर तूफान में इतनी शक्ति होगी कि यह पूरी धरती की विद्युत व्यवस्था को ठप कर देगा। इस बात के खंडन के बावजूद नासा 2006 से इस तूफान पर नजर रख रहा है। पिछले माह आई नासा की रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि यह तूफान 2012 में धरती से टकरा सकता है। 1859 और 1921 में भी इसी तरह के तूफान ने दुनिया भर में हलचल मचा दी थी और बड़े पैमाने पर टेलीग्राफ तारों के क्षतिग्रस्त होने का कारण बना था। 2012 में आने वाले सौर तूफान के इससे भी ज्यादा विध्वंसक होने की आशंका जताई गई है। खगोल विज्ञान के प्रोफेसर डेव रेनेक ने इस बारे में कहा, सौर खगोलविदों के बीच आम राय यह है कि आने वाला यह सौर तूफान (2012 या 2013 तक आने की आशंका) पिछले 100 सालों में सबसे ज्यादा अशांति लाने वाला सिद्ध होगा। सूर्य अब अपनी सुसुप्त अवस्था से धीरे-धीरे जाग रहा है। उसके पूरी तरह से जागने पर भयंकर सौर लपटें उठेंगी, जो तूफान बनकर धरती पर भयंकर तबाही मचाएंगी। यह तूफान सभी कृत्रिम उपग्रहों को नष्ट कर देगा, जिससे पूरी संचार व्यवस्था और हवाई सेवाएं ठप हो जाएंगी। अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने वाशिंगटन में अमेरिकन एसोसिएट फॉर द एडवांसमेंट ऑफ साइंस की सालाना बैठक में इस मुद्दे पर विस्तृत विचार विमर्श किया है। इससे पहले 1972 में भी सोलर तूफान आया था, जिसने अमेरिका के इलिनॉयस में टेलीफोन संचार व्यवस्था में गड़बड़ी पैदा की थी। कनाडा के क्यूबेक में 1989 में इस वजह से पूरे शहर की बिजली गुल हो गई थी। इन दोनों ही घटनाओं का असर सीमित स्थान पर दिखा था। पर 2012-13 में आने वाले सोलर तूफान पूरी दुनिया को चपेट में ले सकता है। नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार अगले तीन वर्षो के दौरान उसकी सतह पर उठने वाली सौर लपटों का प्रभाव हमारी धरती पर भी पड़ेगा। इसकी शुरुआत 1 अगस्त 2010 से हो चुकी है और यह सौर सक्रियता 2013-14 तक जारी रहेगी। इस वर्ष की 14 फरवरी की रात में सूरज की सतह पर हुए विस्फोट से चीन का रेडियो संचार बाधित हो गया था। हालांकि यह पिछले विस्फोटों के मुकाबले बहुत छोटा था। पर 2013-14 तक सूरज की सतह पर कई विस्फोट होंगे, जिससे पूरी धरती की जलवायु और मौसम भी बदल सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले दिनों में हमारी धरती बड़े सौर तूफानों से निकली तरंगों से प्रभावित हो सकती है। सूर्य के कोरोना से निकलने वाली अस्वाभाविक चुंबकीय लपटों से विद्युत आवेशित बादल हमारी पृथ्वी की ओर बढ़ने लगे हंै। वैज्ञानिकों ने धरती पर सौर-सुनामी आने की चेतावनी दी है। नासा के सोलर डायनोमिक्स आब्जर्वेटरी (एसडीओ) सहित कई उपग्रहों ने 1 अगस्त 2010 को सूर्य के सन-स्पाट 1092 से छोटी सौर लपटें रिकार्ड की हैं, जो आकार में पृथ्वी के बराबर हैं। उपग्रहों ने ठंडी गैसों के बड़े-बड़े तंतु भी रिकॉर्ड किए हैं, जो सूर्य के उत्तरी गोलार्द्ध में फैले हुए हैं। अंतरिक्ष में इसमें धमाका भी हुआ है। न्यू साइंटिस्ट ने खबर दी है कि यह सूर्य के कोरोना का हिस्सा है। इस धमाके को कोरोनल विस्फोट कहा जा रहा है। यह अविश्वसनीय रूप से नौ करोड़ 30 लाख मील तक फैल चुकी है। यह सौर सुनामी पृथ्वी की ओर बहुत तेजी से बढ़ रही है। इसमें कहा गया है कि जब ये उच्छृंखल बादल टकराएंगे तो वे कभी भी धु्रव के ऊपर आकाश में तेज रोशनी उत्पन्न कर सकते हैं और ये उपग्रहों के लिए खतरा उत्पन्न कर सकते हैं। हालांकि गंभीर रूप से खतरा नहीं है, लेकिन सूर्य की सतह पर जब कोई बड़ी सौर लपट उठेगी तो उसका प्रभाव धरती पर पड़ सकता है। सूरज की सतह पर उठने वाली विशाल सौर लपटें या ज्वालाएं हमारी धरती के वातावरण को भी प्रभावित करेंगी। नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार, अगले तीन वर्षो में सौर गतिविधियां इतनी बढ़ जाएंगी कि हम धरतीवासियों के लिए विनाशकारी साबित होंगी। अभी से इस प्राकृतिक आपदा की काट खोजी जाने लगी है। पिछले सप्ताह दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने इन विनाशकारी लपटों से धरती को बचाने के लिए वाशिंगटन में आयोजित अंतरिक्ष सम्मेलन में विचार-विमर्श किया है। इस समस्या के आकलन के लिए नासा सोलर डायनामिक्स आब्जरवेटरी सहित दर्जनों उपग्रहों का प्रयोग कर रहा है। दो साल पहले नेशनल अकेडमी ऑफ साइंसेज द्वारा इस समस्या का गंभीरता से अध्ययन किया गया। इस रिपोर्ट में पहली बार इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभावों का उल्लेख किया गया था। नासा के अनुसार, हर 22 साल बाद सूरज की चुंबकीय ऊर्जा का चक्र शीर्ष पर होता है। इसके साथ ही हर 11 साल की अवधि में इससे निकलने वाली लपटों की संख्या सर्वाधिक होती है। सूरज के इन दोनों विनाशकारी अवगुणों वाली अवधि साल 2013 में एक साथ मिल रही है। इससे सूरज से सबसे ज्यादा विकिरण हो सकता है। इससे निकलने वाली लपटों और चुंबकीय ऊर्जा में तेजी से वृद्धि हो सकती है। यह धरतीवासियों के लिए खतरनाक होगा। सौर ज्वालाओं से फूटने वाला यह विकिरण वैज्ञानिक भाषा में विद्युत चुंबकीय ऊर्जा के नाम से जाना जाता है। इसमें वे तमाम किरणें समाई रहती हैं, जिन्हें हम आमतौर पर गामा किरणें, एक्स किरणें, पराबैंगनी किरणें आदि नामों से पुकारते हैं। सूरज से आने वाली समस्त ऊर्जा इन्हीं विकिरणों के रूप में वायु में धरती तक पहुंचती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इन सौर लपटों की शक्ति सैकड़ों हाइड्रोजन बमों के बराबर होती है। इसकी विद्युत चुंबकीय शक्ति हमारी दूरसंचार प्रणाली, विद्युत आपूर्ति व्यवस्था और अंतरिक्ष में घूमते उपग्रहों को ठप कर सकती है। हाईटेक तकनीकों पर इसका गहरा असर पड़ सकता है। पिछली बार 12 जुलाई 2000 में जब सौर लपटें उठीं थी तो अंतरिक्ष में चक्कर लगाते कृत्रिम उपग्रहों में अचानक गड़बड़ी पैदा हो गई। रेडियो संदेशों के आदान-प्रदान का सिलसिला कुछ समय के लिए ठप पड़ गया। इस लपट के साथ खरबों टन सौर सामग्री भी धरती की ओर चल पड़ी। इसका धरती के मौसम और वातावरण पर प्रभाव पड़ा, परंतु किसी जान-माल की क्षति नहीं हुई।
Thursday, April 28, 2011
जुगाली से जलेंगे चूल्हे, दौड़ेंगी गाडि़यां!
अगर यह अनुसंधान व्यावहारिक पैमानों पर खरा उतरा तो देश के डेयरी फार्मो के लाखों मवेशी दूध और मांस के उत्पादन के साथ ईधन बनाने में भी मददगार साबित होंगे। इससे वातावरण की हिफाजत होगी, सो अलग। इंदौर जिले के शासकीय पशु चिकित्सा महाविद्यालय से स्नातकोत्तर स्तर पर अनुसंधान कर रहे जुल्फकार उल हक ने मवेशियों की जुगाली के दौरान निकलने वाली मीथेन गैस को संग्रहित करके इसे तरल ईधन में बदलने की परियोजना का खाका खींचा है। उन्होंने बुधवार को बताया, मैं जिस डेयरी फार्म की परिकल्पना को आकार देने की कोशिश में जुटा हूं, उसमें मवेशियों को आहार दिए जाने के बाद उनके मुंह पर विशेष नलियां लगा दी जाएंगी। हक ने बताया कि ये नलियां पशुओं की जुगाली और डकार के दौरान निकलने वाली मीथेन गैस को जमा करेगी, जिसे एक चैंबर में पहुंचाकर तरल ईधन में बदल दिया जाएगा। मीथेन उन ग्रीनहाउस गैसों में शामिल है, जिनकी ग्लोबल वॉर्मिग बढ़ाने में अहम भूमिका मानी जाती है। हक ने कहा, तरल मीथेन को ईधन के रूप में वाहनों और खाना पकाने में इस्तेमाल किया जा सकता है। चूंकि देश में मवेशियों की आबादी दुनिया के दूसरे मुल्कों के मुकाबले बेहद ज्यादा है। लिहाजा, इस तरह की परियोजना से ग्लोबल वॉर्मिग पर नियंत्रण में भी मदद मिलेगी। हक ने बताया कि एक अनुमान है कि जुगाली करने वाला मवेशी आमतौर पर दिन भर में 250 से 500 लीटर मीथेन वातावरण में छोड़ सकता है। लिहाजा इस बारे में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय खासा चिंतित है। उन्होंने बताया कि उनकी परिकल्पना को इंडियन एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ वेटरनरी रिसर्च (आइएएवीआर) के जयपुर में फरवरी के दौरान राष्ट्रीय अधिवेशन में सर्वश्रेष्ठ नवाचारी विचार के रूप में पुरस्कृत किया जा चुका है। युवा अनुसंधानकर्ता इन दिनों अपनी परिकल्पना को परिष्कृत और व्यावहारिक रूप देने में जुटा है|
Saturday, April 23, 2011
अंतरिक्ष में लंबी छलांग
पीएसएलवी के सफल प्रक्षेपण पर लेखक की टिप्पणी
20 अप्रैल, 2011 का दिन अंतरिक्ष अभियान के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक दिन बन गया है। इस दिन धु्रवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान यानी पीएसएलवी अपने 18वें अभियान पर श्रीहरिकोटा प्रक्षेपण स्थल के अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित हुआ और उड़ान भरने के करीब 18 मिनट बाद 822 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित कक्षा में तीन उपग्रहों रिसोर्ससैट-2, यूथसैट और सिंगापुर के एम्ससैट को स्थापित करने में सफल रहा। पीएसएलवी सी-16 द्वारा स्थापित किए उपग्रहों में से इसरो द्वारा निर्मित आधुनिक दूर संवेदी उपग्रह रिसोर्ससैट-2 का वजन 1206 किलोग्राम है। इस भारतीय उपग्रह से प्राकृतिक संसाधनों के अध्ययन तथा प्रबंधन में काफी मदद मिलेगी। यह अंतरिक्ष में रिसोर्ससैट-1 की जगह लेगा जिसे सन 2003 में स्थापित किया गया था। इसकी जीवनकाल पांच साल का होगा। रिसोर्ससैट-2 28 अप्रैल से ही तस्वीरें भेजनी शुरू कर देगा। पीएसएलवी की मदद से स्थापित दूसरा उपग्रह यूथसैट 92 किलो का है। इस उपग्रह को भारत व रूस ने संयुक्त रूप से विकसित किया है। इससे तारों एवं मौसम के अध्ययन में मदद मिलेगी। तीसरा सिंगापुर का एक्ससैट उपग्रह 106 किलोग्राम का है। इसे सिंगापुर की नेनयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी ने बनाया है। इसका उपयोग मानचित्रीकरण के लिए किया जाएगा। रिसोर्ससैट-2 की लागत 140 करोड़ रुपये है। इसमें दो सॉलिड स्टेट रिकॉर्डर हैं। प्रत्येक रिकॉर्डर की तस्वीरें कैद करने की क्षमता 200 जीबी है। इसमें एक ही प्लेटफॉर्म पर उच्च, मध्यम तथा हाई रिजोल्यूशन कैमरे लगे हैं। ये अत्याधुनिक कैमरे फसलों की स्थिति के आकलन में सहायता प्रदान करेंगे। इसके अलावा कैमरे वनों की कटाई की स्थिति, झीलों व जलाशयों का जल स्तर, हिमालय में पिघलने वाली बर्फ तथा पोतों के लिए निगरानी प्रणाली का कार्य करेंगे। पोतों की निगरानी प्रणाली के लिए इसमें कनाडा के कॉमडेव द्वारा निर्मित स्वचालित पहचान प्रणाली लगी है जिससे पोतों के स्थान व उनकी गति जैसी जानकारियां हासिल होंगी। रिसोर्ससैट-2 के कक्षा में स्थापित होने के बाद इसरो के उपग्रह केंद्र निदेशक टीके एलेक्स ने कहा कि इसे सही कक्षा में स्थापित किया गया है। इसके सौर पैनल सुचारू रूप से काम कर रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि इसके चित्रों का उपयोग 15 देश करेंगे जो इसे वैश्विक मिशन का दर्जा देता है। इसके साथ ही कृषि, जल संसाधन, ग्रामीण विकास, जैविक संसाधन और भौगोलिक संभावनाओं से जुड़े विशिष्ट क्षेत्रों में निगरानी भी हो सकेगी। इसरो के अध्यक्ष के. राधाकृष्णन ने मिशन को भव्य सफलता की संज्ञा देते हुए कहा कि इस सफलता से पीएसएलवी की विश्वसनीयता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। पिछले वर्ष जीएसएलवी की दो लगातार असफलताओं के बाद यह सफलता वैज्ञानिकों का मनोबल बढ़ाने वाली है। 25 सितंबर, 2010 को जीएसएलवी मिशन तब असफल हो गया था जब वह प्रक्षेपण के 47 सेकेंड बाद ही आग की लपटों में घिरकर नष्ट हो गया। 15 अप्रैल, 2010 को भी जीएसएलवी डी-3 विफल हो गया था। इन दोनों विफलताओं से भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को तगड़ा झटका लगा था। पीएसएलवी श्रृंखला का पहला अभियान 20 सितंबर, 1993 को शुरू हुआ था जो कि असफल रहा था, लेकिन उसके बाद के सभी 17 अभियान सफल रहे हैं। अब तक अनेक देशों ने उपग्रह बनाए हैं, लेकिन मात्र 10 देश ही उन्हें लांच व्हीकल के जरिये कक्षा में स्थापित करने में सफलता हासिल कर पाए हैं। ऐसे देशों में रूस, अमेरिका, यूक्रेन, फ्रांस, जापान, चीन, ब्रिटेन, भारत, इजरायल व ईरान हैं। निश्चित रूप से भारत की यह सफलता गौरवान्वित करने वाली है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
Monday, April 11, 2011
प्रयोगशाला में बनाई किडनी
वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने प्रयोगशाला में स्टेम कोशिकाओं की मदद से गुर्दा (किडनी) तैयार कर लिया है। इस विकास को चिकित्सा जगत में बड़ी सफलता माना जा रहा है। इसके बाद अब प्रत्यारोपण के लिए इस अंग की कमी से निपटने में मदद मिलेगी। स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग विश्वविद्यालय के एक शोध दल को यह अभूतपूर्व कामयाबी मिली है। स्टेम कोशिकाएं शरीर के निर्माण में बेहद अहम भूमिका निभाती हैं। द स्कॉट्समैन की खबर के अनुसार, प्रयोगशाला में बनकर तैयार इस अंग की लंबाई भू्रण में गुर्दे के आकार के बराबर यानी आधा सेंटीमीटर है और इसे बनाने वाले दल को उम्मीद है कि यह छोटा सा गुर्दा मानव शरीर में प्रत्यारोपित होने के बाद बढ़कर सामान्य गुर्दे के बराबर हो जाएगा। यहां तक कि इस गुर्दे को तैयार करने में अमीनियोटिक द्रव्य की कोशिकाओं का प्रयोग किया गया है। यह द्रव्य गर्भ में बच्चे के चारों ओर फैला रहता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चे के जन्म के समय चिकित्सक इस द्रव्य को एकत्रित कर सकते हैं और तब तक संचित रख सकते हैं जब तक गुर्दे की बीमारी वाले मरीज को इसकी जरूरत नहीं पड़ती। नए गुर्दे के निर्माण के लिए व्यक्ति की खुद की अमीनियोटिक द्रव्य कोशिकाएं इस्तेमाल की जा सकती हैं। ऐसा करने से उस समस्या का भी अंत होगा जब किसी मृतक देनदाता के अंग का इस्तेमाल करने को लोग खारिज कर देते हैं। इस दल के प्रमुख प्रोफेसर जैमी डेवीस ने कहा कि सोच यह थी कि मानव स्टेम कोशिकाओं से शुरुआत की जाए और कार्यशील अंग पर खत्म। अगर आपके पास टेस्ट ट्यूब में स्टेम कोशिकाओं का गच्च्छा मौजूद हो तो इसे जटिल गुर्दे जैसा अंग बनने में बेहद लंबा सफर तय करना होगा। उन्होंने कहा कि इसलिए हम इस पर काम कर रहे हैं कि कैसे तरल में तैरती कोशिकाओं को आप कुछ ऐसे व्यवस्थित करते हैं कि वह गुर्दे के रूप में तब्दील हो जाएं। उन्होंने कहा कि हमने इस संबंध में काफी अच्छी प्रगति की है। हम कुछ ऐसा बना सकते हैं जो जटिलता के मामले में सामान्य भ्रूणीय गुर्दे जैसा हो मगर अभी तक परिपक्व नहीं हुआ हो। मानव में इस गुर्दे का प्रत्यारोपण संभव बनाने के लिए स्कॉटलैंड और अमेरिका के शोध दल विभिन्न तकनीकों पर काम कर रहे हैं। मिशिगन के दल ने भ्रूणीय स्टेम कोशिकाओं को गुर्दे की स्टेम कोशिकाओं में बदलने के लिए रसायनों का प्रयोग किया|
अब चांद पर खनन की तैयारी!
कंपनियां अब धरती के साथ-साथ चांद पर भी कारोबार के लिए संभावनाएं तलाश रही हैं। इसी कड़ी में भारतीय मूल के एक कारोबारी की ओर से स्थापित कंपनी ने चंद्रमा पर खनन की योजना बनाई है और इसके लिए एक विशेष रोबोट का निर्माण किया जा रहा है, जो इस उपग्रह पर संभावित खनिज पदार्थो का पता लगाएगा। मून एक्स नामक इस कंपनी की बुनियाद भारतीय मूल के कारोबारी नवीन जैन ने रखी थी। वह नासा के एमेस रिसर्च सेंटर के साथ मिलकर रोबोट का निर्माण कर रही है। समाचार पत्र लॉस एंजिल्स टाइम्स के मुताबिक जैन ने कहा, इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि चांद पर खनिज संपदा है, हालांकि मून एक्स का मानना है कि वहां सोने की खदान हो सकती है। उन्होंने कहा, एक कारोबारी के नजरिए से देखें तो चंद्रमा पर मौजूद संसाधानों को लेकर कभी सही ढंग से पड़ताल नहीं की गई। हमारा मानना है कि वहां ऐसे संसाधन हो सकते हैं, जो पृथ्वी और पूरी मानवता के लिए फायदेमंद हों। खबर में लिखा गया है कि मून एक्स की मशीनों को ऐसे खनिज ढूंढ़ने के लिए डिजाइन किया गया है जो धरती पर तो कम मात्रा में हैं मगर क्रूज मिसाइल से लेकर कार बैटरी तक सब जगह पाए जाते हैं। जैन ने कहा, मून एक्स को वर्ष 2013 तक चंद्रमा की सतह पर उतरने के लिए तैयार रहना चाहिए। वहां सबसे पहले पहंुचना हमारा लक्ष्य है। मून एक्स में नासा के पूर्व इंजीनियरों सहित कुल 25 लोग काम करते हैं। कंपनी को नासा से एक करोड़ डॉलर का ठेका मिला है। यह कंपनी कई अन्य कंपनियों के साथ गूगल ल्यूनर एक्स पुरस्कार जीतने की होड़ में है। तीन करोड़ इनामी राशि वाली इस प्रतियोगिता को जीतने के लिए चंद्रमा की सतह पर सबसे पहले अपने रोबोट को उतारना होगा। यह रोबोट कम से कम एक मील के एक तिहाई हिस्से तक खनन में सक्षम होना चाहिए और 2016 से पहले उच्च्च गुणवत्ता वाले वीडियो और तस्वीरों को धरती पर भेज दे। जैन ने कहा कि निजी खर्चे पर चांद पर खनन के लिए संसाधन जुटाना ज्यादा चिंता की बात नहीं हैं। उन्होंने कहा, मैं यह भी सोचता हूं कि हमारे महासागरों के जल की तरह ही चंद्रमा के साथ भी भिन्न बर्ताव नहीं किया जाएगा। ऐसे मामले में, जल पर किसी का अधिकार नहीं होता मगर कोई भी कंपनी या देश कुछ निश्चित सुरक्षा या नैतिक दिशा निर्देशों को ध्यान में रखते हुए अंतरराष्ट्रीय जल से संसाधनों का खनन कर सकता है|
Wednesday, April 6, 2011
जीवन का चौथा रूप खोजा!
धरती पर लंबे समय से जीवन के चौथे रूप के अस्तित्व को लेकर जीव विज्ञानियों के बीच बहस चल रही है। अब जाकर अमेरिकी वैज्ञानिकों को धरती पर जीवन के चौथे रूप की मौजूदगी के ठोस प्रमाण मिले हैं। उल्लेखनीय है कि धरती पर जीवों को अभी तीन रूप में विभाजित किया गया है। पहले जटिल शारीरिक रचना वाले जानवर, मनुष्य, पेड़-पौधे, दूसरे बैक्टीरिया और तीसरे आर्किया हैं। इनमें आखिरी दो सूक्ष्मजीवियों में आते हैं। अब कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में जीवविज्ञान के प्रोफेसर जोनाथन ईसेन ने दावा किया कि उन्होंने चौथी श्रेणी को खोज लिया है। उन्होंने अपने साथी शोधकर्ता डॉ. क्रेग वेंटर द्वारा दुनिया के दौरे पर इकट्ठे किए गए डीएनए के अध्ययन के लिए जटिल जीन संरचना तकनीकी का इस्तेमाल किया। उन्होंने पाया कि डीएनए के इन नमूनों में मौजूद जीन जीवन के मौजूदा तीनों रूपों में से किसी से मेल नहीं खाते। उनका कहना है कि ये जीन किसी चौथे जीव के हो सकते हैं। नए डीएनए को जीवन के किसी भी वर्ग में डालने के प्रयास में असफल साबित होने पर प्रोफेसर ईसेन ने अपने तथ्यों को पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ साइंस पत्रिका में प्रकाशित किया है, ताकि अन्य वैज्ञानिक अपनी जानकारियों के साथ इस काम में मदद के लिए आगे आएं। सवाल यह है कि ये डीएनए कहां से आए? क्या ये किसी अलग प्रकार के वायरस से ताल्लुक रखते हैं? अगर ऐसा है तो जीवन के चौथे रूप का अस्तित्व अपने आप में काफी रोचक है। सबसे बड़ी बात यह है कि ये जीवन वृक्ष की एकदम नई शाखा का का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। प्रोफसर ईसेन के हवाले से द डेली टेलीग्राफ ने लिखा है, हालंाकि अभी तक हमें इसके पीछे की पूरी कहानी मालूम नहीं पड़ी है। आखिर में हमने तय किया कि इस अध्ययन को प्रकाशित कराया जाए ताकि अन्य लोग भी इस मामले पर विचार कर सकें। इन नए जीन का अध्ययन करने में कठिनाई इनके अल्प मात्रा में उपलब्ध होने के कारण आ रही है। मगर डॉ. वेंटर के तरीके का इस्तेमाल कर ईसेन ने मानव जनेटिक कोड को पढ़ने का सफल प्रयास किया। उन्होंने इस तकनीक को मेटाजीनोमिक्स नाम दिया है। इसके तहत डीएनए को टुकड़ों में विभाजित कर दिया जाता है और उनको डिकोड कर लिया जाता है। इसके पश्चात इन्हें सही क्रम में फिर से व्यवस्थित कर दिया जाता है। सस्ते और शक्तिशाली कंप्यूटरों के कारण विज्ञान को बड़ा फायदा पहुंचा है। डॉ. वेंटर द्वारा 2003 से 2007 के बीच दुनियाभर के समुद्रों से एकत्रित किए नमूनों पर शोधदल ने अपनी तकनीक को इस्तेमाल किया। प्रोफेसर ईसेन आरईसी ए और आरपीओ बी नामक दो जीनों पर अटक गए। ये दोनों पुराने और प्रचूर मात्रा में थे जिनकी विशेषताएं सार्वजनिक जनेटिक डाटाबेस से बिल्कुल अलग थीं। इस खोज के वर्गीकरण के लिए शोध जारी है मगर समस्या यह है कि यह जानकारी नहीं है कि ये जीन आखिर आए कहां से। इन्हें सामान्य तौर पर लिए गए समुद्री जल के नमूनों से हासिल किया गया है|
Monday, April 4, 2011
पृथ्वी होगी मंदिर सी लाल
सुर्ख लाल और गर्म ग्रह मंगल हमेशा से ऐसा नहीं था। ताजा वैज्ञानिक अनुमान यही है। इस पर भी सनसनीखेज वैज्ञानिक दावा यह है कि मंगल के लाल रंग का होने की वजह वहां लाखों साल पहले हुआ परमाणु विस्फोट है। यानी अगर जीवनदायिनी धरती पर भी ऐसे ही परमाणु धमाके हुए यह तो यह भी निर्जन और लाल रंग की हो जाएगी। डॉ. जॉन ब्रैंडेनबर्ग का मानना है कि 1800 लाख साल पहले संभवत: किसी ग्रह के टकराने से वहां प्राकृतिक रूप से अत्यधिक भीषण परमाणु विस्फोट हुए जिससे वहां सब कुछ तहस-नहस हो गया। उससे उठे भीषण ताप और झटके से वहां सबकुछ सूखी रेत में तब्दील हो गया। उनका कहना है कि मंगल ग्रह की सतह पर रेडियोएक्टिव पदार्थो की एक पतली परत है। इसमें यूरेनियम, थोरियम और रेडियोएक्टिव पोटैशियम शामिल है। उन्होंने फॉक्स न्यूज को बताया कि इस पदार्थो के साथ ही सतह पर एक जगह लाल धधकता हुआ विशालकाय धब्बा है। उनका मानना है कि यह परमाणु कण इसी धब्बे से ग्रह की पूरी सतह पर फैले हैं। उनका अनुमान है कि किसी परमाणु विस्फोट से उसका सारा मलबा पूरे ग्रह की सतह पर फैल गया होगा। मंगल ग्रह पर गामा किरणों से मिले नक्शे के अनुसार ग्रह पर एक बड़ा लाल धब्बा है। इन गामा किरणों की मदद से पता चलता है कि परमाणु विकिरण का केंद्र यही धब्बा है। आर्बिटल टेक्नोलॉजीस कॉर्प के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. ब्रैंडनबर्ग के अनुसार प्राकृतिक परमाणु विस्फोट तकरीबन दस लाख एक मेगाटन हाइड्रोजन बम विस्फोटों के बराबर रहा होगा। यह विस्फोट मंगल ग्रह के उत्तरी मेर एसिडेलियम क्षेत्र में हुआ होगा। इसीलिए यहां पर भारी मात्रा में परमाणु विकिरण देखा जा सकता है। उन्होंने बताया कि इन्हीं धमाकों के कारण इस क्षेत्र में रेडियो तरंगों के थक्के बन गए। जिन्हें कि हाल में नासा के मंगल ग्रह पर गामा किरणें डालकर उसकी परतों के आंकड़े एकत्र करने के दौरान पाया गया। इस रेडियोधर्मिता से यह भी साफ हो जाता है कि मंगल ग्रह लाल रंग का क्यों दिखता है। नासा के एकत्र किए इन आंकड़ों के आधार पर डॉ. ब्रैंडनबर्ग का सिद्धांत यह है कि इस प्राकृतिक परमाणु विस्फोट के चलते ही मंगल ग्रह उजड़ गया और वहां पर मौजूद हर चीज खत्म हो गई। उनका मानना है कि कभी पृथ्वी पर भी ऐसा ही प्राकृतिक परमाणु विस्फोट संभवत: होता तो सबकुछ खत्म हो जाता। यानी पृथ्वी भी मंगल ग्रह जैसी वीरान और लाल रंग की हो जाएगी। नासा के जेट प्रोपुलजन के मंगल ग्रह कार्यक्रम के साइंस मैनेजर डॉ. डेविड बेटी का कहना है कि यह अवधारणा बहुत ही तार्किक है कि लेकिन पुख्ता वैज्ञानिक आधार के लिए मंगल ग्रह के मेर एसिडेलियम क्षेत्र में एक अभियान भेजना होगा। पहली बार वैज्ञानिकों ने मंगल ग्रह पर जीवन की संभावना ढूं्ढने के बजाय वहां पर हुए विनाश की थ्योरी पर काम किया है। हो सकता है इससे ही जीवन के संकेत भी साफ हो सकें|
Monday, March 28, 2011
दिल की बिन चीरा सर्जरी
भारतीय मूल के एक डॉक्टर के नेतृत्व में ब्रिटेन के चिकित्सकों के दल ने एक नई तरह की हार्ट सर्जरी करने में सफलता हासिल की है। यह पद्धति ओपन हार्ट सर्जरी कराने में अक्षम मरीजों के लिए जीने की एक नई आस है। इस ऑपरेशन से मरीज के शरीर में एक छोटे से छेद के जरिये उसके हार्ट वॉल्व को बदला जा सकता है। और यह चमत्कार बस एक घंटे में हो जाएगा। इस पद्धति को ट्रांसकैथेटेरोएर्टिक वॉल्व इंप्लान्टेशन (टीवीएआइ) नाम दिया गया है। दल का नेतृत्व कर रहे गाय्ज एंड सेंट थॉमस हॉस्पिटल के डॉक्टर विनायक बापट के हवाले से डेली मेल ने कहा, टीवीएआइ उन मरीजों के लिए वरदान है, जो गंभीर रूप से बीमार और कमजोर होने के कारण हार्ट सर्जरी कराने में अक्षम है। यह पद्धति काफी सस्ती और सरल है, जिसमें मरीज के सीने या जांघ में एक छोटा सा चीरा लगा कर हार्ट वॉल्व को बदला जा सकता है। टीवीएआइ के इस ऑपरेशन के बाद मरीज चार से छह दिनों में घर वापस जा सकता है जबकि ओपन हार्ट सर्जरी के बाद मरीज को दस दिन तक अस्पताल में बिताना पड़ते हैं। पैपवर्थ अस्पताल में इस पद्धति से इलाज कराने वाले यूरोप के पहले व्यक्ति 54 वर्षीय जॉन क्रोनिन ने कहा, टीवीएआइ ने मेरी जान बचा दी। पहले मैं छोटे से छोटा काम करने में बुरी तरह से हांफ जाता था, लेकिन अब मैं आसानी से साइकिल भी चला पाता हूं। एरोटिक स्टेनोसिस नामक दिल के वाल्व को बंद करने वाली यह बीमारी काफी आम है। यह कई दफा बचपन से ही दिल में गतिरोध होने के बावजूद बुढ़ापे में उभरती है। हृदय के प्रमुख एरेटिक वाल्व में कैल्शियम बनने से यह उत्पन्न होती है जिससे दिल में रक्त का प्रवाह कम हो जाता है। अब तक बाईपास सर्जरी के जरिए मरीज के सीने में चीरा लगाकर उसके दिल को एक बाईपास मशीन पर सेट कर दिया जाता है और उस दौरान खराब हो चुका एरोटिक वाल्व बदल दिया जाता है। हालांकि नई पद्धति में मरीज की जांघ या दिल में एक नन्हा से छेद करके एक बहुत बारीक स्टेनलेस स्टील की पत्ती डाली जाती है। इसके सिरे पर गाय के दिल के ऊतक लगे होते हैं। इसके दूसरे सिरे पर एक गुब्बारा होता है। यह गुब्बारा एक तरह से वाल्व का काम करता है। गाय का यह ऊतक बहुत नरम होता है जो मृत गाय के दिल से तुरंत निकालकर मरीज के इस ऑपरेशन में इस्तेमाल होता है|
Saturday, March 26, 2011
एयरब्रश तकनीक
अब आपको फोटो खिंचवाने के लिए मेकअप करने की आवश्यकता नहीं है! जापानी वैज्ञानिकों ने विशेष एयरब्रश तकनीक वाला एक उच्च प्रौद्योगिकी का कैमरा विकसित करने का दावा किया है। इसकी मदद से तस्वीर में आपके दांतों तक को मोतियों जैसा सफेद बनाया जा सकता है। डेलीमेल के अनुसार पैनासोनिक कंपनी के ल्यूमिन डीएमसी-एफएक्स 77 कैमरे में ब्यूटी रीटच मोड होता है जिसकी मदद से तस्वीर में व्यक्ति के दांतों को सफेद बनाया जा सकता है, गालों पर रंगत लाई जा सकती है और चेहरे की झुर्रियों तक को कम किया जा सकता है। इस कैमरे में एयरब्रशिंग सॉफ्टवेयर, 16-मेगापिक्सल सेंसर और 3.5 इंच की एलसीडी टच स्क्रीन है। इसको बनाने वालों का दावा है कि इससे फोटो में चेहरे के मेकअप के साथ ही त्वचा को सपाट या चिकना दिखाया जा सकता है। डेली मेल की रिपोर्ट के अनुसार, आपके चेहरे की तस्वीर लेने के साथ कैमरे में मौजूद विभिन्न मोड अलग-अलग कार्य करते हैं। उदाहरण के लिए, एस्थेटिक मोड त्वचा को साफ और दांतों को चमकाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, बेहतर चेहरे को फिक्स करने के लिए तस्वीर पर विभिन्न ग्रेड इस्तेमाल किए जा सकते हैं। ज्यादा गहन स्तर तस्वीर के विवरण को ज्यादा आकर्षक बनाने की जगह भद्दा भी बना सकते हैं। शोधकर्ताओं ने बताया कि संभवत: मेकअप मोड इस कैमरे का सबसे रोचक फीचर है। इसके जरिए फाउंडेशन लगाने के लिए रंगों और टोन्स का चुनाव किया जा सकता है, ब्लश और यहां तक की लिपस्टिक को भी मनमुताबिक आकर्षक बना सकते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि पूरी तरह परीक्षण के बिना हालांकि यह कहना मुश्किल है कि इसके अंतिम परिणामों में वास्तविक सुधार आ सकता है या नहीं|
Wednesday, March 23, 2011
ज्वालामुखी ने डाली थी जीवन की नींव
ज्वालामुखी विस्फोट और बिजली की कड़क भले ही दिल दहलाने वाली होती है, लेकिन इनके जरिये ही पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत हुई है। एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है। जिसे प्रोसीडिंग ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस की पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। डेली मेल के अनुसार, सेन डियागो स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ता अमेरिकी प्रोफेसर स्टेन्ले मिलर के पांचवें दशक में किए गए एक शोध में पाए गए प्री-मोर्डियल सूप गैस के नमूनों पर आधुनिक तकनीक के जरिये पुन: विश्लेषण करने के बाद इस नतीजे पर पहुंचे हैं। दल का नेतृत्व कर रहे कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और स्टेन्ले के छात्र रहे जेफरी बाडा ने कहा, हमारे शोध में पाया गया अमीनो एसिड स्टेन्ले के नमूनों से काफी बेहतर है, ये हमारे 2008 से चल रहे अध्ययन को बढ़ाने के साथ साथ यौगिकों की विविधता को भी प्रभावित करेगा, जिसे हम किसी निश्चित गैसीय मिश्रण से प्राप्त कर सकते है। बाडा ने एक हजार गुना अधिक संवेदनशील तकनीक का इस्तेमाल कर जीवन के लिए आवश्यक अमीनो एसिड की श्रृंखला का पता लगाया है। प्रोफेसर स्टेन्ले ने 1953 में एक शोध में पृथ्वी पर जीवन के शुरुआत के पहले (लगभग 40 करोड़ साल) की वायुमंडलीय परिस्थिति बनाने की कोशिश थी। स्टेन्ले ने मिथेन, अमोनिया, वाष्प और हाइड्रोजन के मिश्रण में विद्युत तरंग के जरिये अमिनो एसीड और दूसरे कार्बनिक यौगिक बनाने में सफलता हासिल की थी। हालांकि उन्हें जीवन के वास्तविक घटक प्री-मोर्डियल सूप को हासिल करने में पूरी तरह से कामयाबी नहीं मिल पाई थी। वर्ष 1958 में अपने दूसरे शोध में स्टेन्ले ने मिश्रण में ज्वालामुखी से निकलने वाली जहरीली गैस हाइड्रोजन सल्फाइड को मिलाकर एक निर्णायक कदम उठाया था। कोलंबिया विश्वविद्यालय में किए गए उनके शोध का विश्लेषण नहीं किया गया था। हालांकि इसके दस्तावेजों को संभालकर जरूर रखा गया था। प्रोफेसर बाडा के परिणामों में कार्बनिक यौगिकों की प्रचूरता का खुलासा हुआ। इनमें 23 अमीनो एसिड भी शामिल थे। एक श्रृंखला में जुड़े करीब 20 अमीनो एसिड प्रोटीन बनाते हैं जो सभी जीवित प्राणियों के लिए कार्बनिक तंत्र और कोशिका निर्माण के लिए सामग्री उपलब्ध कराता है। अमीनो एसिड की प्रचूरता प्रोफेसर मिलर के वास्तविक प्रीमोर्डियल सूप प्रयोग और दो इसके अगले अध्ययनों में उत्पादित अमीनो एसिड से ज्यादा थी। अध्ययन के परिणाम इस बात का समर्थन करते हैं कि जीवन की उत्पत्ति में ज्वालामुखियों की अहम भूमिका थी। ज्वालामुखी विस्फोट से काफी मात्रा में हाइड्रोजन सल्फाइड और बिजली की कड़क निकलती है। जब पृथ्वी अपनी युवावस्था में थी तब इस तरह की घटनाएं बेहद आम थीं। बाडा ने यह भी पाया कि स्टेन्ले के नमूनों में मौजूद अमीनो एसिड उल्का पिंडों में मौजूद अमिनो एसिड जैसे ही हैं, जिससे संकेत मिलता है कि हाइड्रोजन सल्फाइड के निर्माण की प्रक्रिया ने पूरे सौरमंडल में जीवन के बीज बोने में मदद की होगी|
Friday, March 18, 2011
रक्त प्रवाह में बाधा नहीं बनेगा थक्का
ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने वाले प्रोटीन का पता लगाया है जो थ्रोम्बोसिस के निर्माण में मुख्य भूमिका निभाता है। थ्रोम्बोसिस रक्त के थक्के की एक किस्म है जो हृदयाघात और स्ट्रोक का कारण बना सकती है। थ्रोम्बोसिस बनने में एलएक्सआर प्रोटीन की भूमिका को समझने में कामयाबी मिलने से इसके बेहतर इलाज का मार्ग प्रशस्त हुआ है। इससे हर साल हजारों लोगों की जान बचाई जा सकेगी। अनुसंधान दल के प्रमुख रीडिंग यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोवैस्कुलर एंड मेटाबोलिक रिसर्च के निदेशक प्रोफेसर जॉन गिबन्स का कहना है कि रक्तस्राव रोकने के लिए खून का जमना जरूरी होता है मगर रक्त प्रवाह में खून का जमना एक बीमारी है जो थ्रोम्बोसिस के नाम से जानी जाती है। इससे लोगों को हृदयाघात और स्ट्रोक भी हो सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, एलएक्सआर प्रोटीन को नियंत्रित करने वाली दवाएं बनाकर वैज्ञानिक थ्रोम्बोसिस को रोकने में कामयाब हो सकते हैं और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को भी नियंत्रित कर सकते हैं। ब्लड जर्नल में शोध का विवरण देने वाले शोधकर्ताओं ने कहा कि इससे हृदय और सर्कुलेटरी बीमारियों से लड़ने में मदद मिल सकेगी। ब्रिटेन में इन बीमारियों के कारण हर साल तकरीबन 1.91 लाख लोग मर जाते हैं। यह पहले से ही मालूम है कि प्रोटीन रक्त कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करता है, जिसके कारण रक्त शिराएं संकरी हो सकती हैं और हृदयाघात या स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। मगर शोधकर्ताओं ने पाया है कि एलएक्सआर भी रक्त कोशिकाओं जिन्हें प्लेटलेट्स कहते हैं, की क्रियाविधि को रोकता है। जिससे रक्त का थक्का बन जाता है। यह स्थिति हृदयाघात को उकसा सकती है। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने प्रयोगात्मक दवाओं के साथ चूहे में प्रोटीन पर निशाना साधा। उन्होंने पाया कि इलाज के दौरान छोटे रक्त के थक्के तो बने मगर जल्दी ही इनके निर्माण को तेजी से रोक दिया गया। जिससे रक्त शिराओं को ब्लॉक होने से बचाया जा सका और हृदयाघात होने की संभावना को भी रोक दिया|
Tuesday, March 8, 2011
हार्टअटैक का पता पहले ही
जल्द ही उन लोगों की पहचान संभव हो सकेगी जिन्हें भविष्य में दिल का दौरा पड़ सकता है। भारतीय मूल के एक वैज्ञानिक के नेतृत्व में अनुसंधानकर्ताओं ने दर्जन भर से अधिक ऐसे जीनों की पहचान की है जिनका संबंध दिल की बीमारी से है। ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन के प्रोफेसर निलेश समानी की अगुवाई में एक अंतरराष्ट्रीय दल ने दिल के दौरे की आशंका वाले लोगों के डीएनए में खामी का पता लगाने के लिए 140,000 लोगों की जीन संरचना का अध्ययन किया। इस दौरान वैज्ञानिकों ने हृदय की बीमारी से संबंध रखने वाले 13 नए जीनों की पहचान की। यह संख्या अब तक हृदयाघात से जुड़े ज्ञात जीनों की संख्या से दोगुनी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि उनकी यह खोज हृदयाघात का नया इलाज खोजने में मददगार हो सकती है और उन लोगों का पता लगाने में भी कारगर हो सकती है जिन्हें भविष्य में दिल के दौरे की आशंका हो। प्रोफेसर समानी का कहना है कि चिह्नित किए गए ज्यादातर जीनों के बारे में यह जानकारी नहीं थी कि इनका संबंध कोरोनरी धमनी की समस्या से है जो कि हृदयाघात का मुख्य कारण है। डेली टेलीग्राफ में उनके हवाले से कहा गया है, अब हम अध्ययन करेंगे कि ये जीन कैसे काम करते हैं। निश्चित रूप से तब हम पता लगा सकेंगे कि यह बीमारी कैसे होती है और इसका इलाज कैसे किया जा सकता है। इस अध्ययन में अमेरिका, यूरोप, आइलैंड, ब्रिटेन और कनाडा के 167 चिकित्सक और वैज्ञानिक शामिल थे। उन्होंने लोगों के जनेटिक कोड का अध्ययन किया ताकि वह डीएनए में उन विभिन्नताओं का पता लगा सकें जो कोरोनरी धमनी से संबंधित दिल की बीमारी वाले लोगों में पाई जाती हैं। ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन के प्रोफेसर पीटर वीसबर्ग ने कहा कि जितने बड़े पैमाने पर जनेटिक अध्ययन होता गया हमने उन जीनों की पहचान शुरू कर दी जो दिल की बीमारी के विकास में काफी बड़ी या छोटी भूमिका निभाते हैं। उन्होंने बताया कि हर नए जीन की पहचान के साथ हम कार्डियोवेस्कुलर बीमारी के विकास की जैविक प्रणालियों और उसके नए संभावित इलाज को समझने के करीब आते गए। रोचक बात यह रही कि 13 नए जीन क्षेत्रों में सिर्फ तीन ही कोरोनरी बीमारी से संबंधित थे। ये खतरे के आम कारकों जैसे कोलेस्ट्रॉल के उच्च्च स्तर, रक्तचाप, मधुमेह, धूम्रपान और मोटापे से जुड़े हुए थे। यह अध्ययन नेचर जनेटिक्स जर्नल के ताजे अंक में प्रकाशित किया गया है|
Saturday, February 26, 2011
अब आया दुनिया का सबसे छोटा कंप्यूटर
वैज्ञानिकों ने दुनिया का सबसे छोटा कंप्यूटर बनाने का दावा किया है। इसका आकार मात्र एक वर्ग मिलीमीटर है। यानि इतना छोटा कि आंख की पुतली में समा जाए। यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित इस छोटे से यंत्र को आंख में प्रत्यारोपित करके ग्लूकोमा (मोतियाबिंद) का इलाज किया जा सकता है। फिलहाल इसे कोई नाम नहीं दिया गया है। ब्रिटिश अखबार द डेली मेल के मुताबिक, यह आकार में भले ही छोटा है लेकिन इसमें मेमोरी, प्रेशर सेंसर और एक बैटरी सहित कई उपकरण मौजूद हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक इसमें सोलर सेल और एंटिना समेत वायरलैस रेडियो भी है, जो डाटा को उससे जुड़े उपकरणों को हस्तांतरित कर सकता है। हालांकि इसे अभी बाजार में आने में काफी वक्त लगेगा। इसके निर्माता प्रोफेसर डेनिस सिल्वेस्टर, डेविड ब्लाऊ और डेविड वेंटलोफ का दावा है कि इस यंत्र के रेडियो के लिए उपयुक्त फ्रीक्वेंसी ढूंढ़ने की कोई जरूरत नहीं है। इसलिए इसे वायरलैस कंप्यूटर नेटवर्क से जोड़ा जा सकता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि ऐसी इकाइयों का एक नेटवर्क भविष्य में प्रदूषण का पता लगाने और निगरानी करने के काम भी आएगा। प्रोफेसर सिल्वरस्टेन ने कहा, अगली चुनौती इससे भी छोटा उपकरण विकसित करने की है जिससे हमारे शरीर, पर्यावरण और इमारतों की निगरानी की जा सके। उन्होंने कहा, चूंकि यह बेहद छोटा है इसलिए एक वेफर (सेमीकंडक्टर की बेहद पतली परत) पर सैकड़ों निर्मित किए जा सकते हैं। प्रति व्यक्ति ये हजारों बनाई जा सकती हैं और इसकी यह प्रति बढ़ोतरी सेमीकंडक्टर उद्योग के विकास को जबरदस्त प्रगति दे|
Thursday, February 17, 2011
1969 में धड़का था पहला नकली दिल
देखने में यह भले यह वेलेंटाइन डे कार्ड पर बना दिल का कार्टून लगे। लेकिन असल में यह दुनिया का सबसे पहला और पुराना नकली दिल है जो 1969 में तीन दिन तक धड़का भी था। प्लास्टिक और पॉली फाइबर का बना यह दिल करीब आधा पाउंड का था। इसमें लगे ट्यूब बिस्तर के किनारे रखी एक वाशिंग मशीन के आकार की एक मशीन से जुड़े रहते थे। इस दिल के धड़कने और रक्त का सही दबाव बनाए रखने के लिए इसमें कई स्विच भी लगाए गए थे। इस पुरातन मशीन ने 1969 में अप्रैल के महीने में अमेरिका में हॉस्केल कार्प (47) नाम के मरीज को हृदय प्रत्यारोपण से ऐन पहले तीन दिन तक जिंदा भी रखा था। यानी यह प्लास्टिक का दिल जीवनदायी था। दुर्भाग्यवश यह हृदय प्रत्यारोपण सफल नहीं रहा था। कार्प ह्यूस्टन के सेंट ल्यूक अस्पताल में नया मानव हृदय लगने के लिए दो दिन बाद ही मर गए थे। लेकिन इसके बाद अब से करीब 42 साल पहले सारी दुनिया में यह स्पष्ट हो गया था कि एक कृतिम हृदय भी जीवन दे सकता है। हालांकि उस समय चिकित्सा समुदाय के बहुत से लोगों ने इस ऑपरेशन को अनैतिक करार दिया था। कलाकृतियां संग्रह करने वाले स्मिथसोनियन संस्थान ने पहले प्लास्टिक हृदय का फोटो जारी कर सबको अचंभित कर दिया है। यह फोटो 14 फरवरी को अमेरिकन हार्ट मंथ के अवसर पर जारी किया गया। उस समय चिकित्सा समुदाय की मंजूरी के बगैर यह आपरेशन करने वाले उस समय के सबसे बड़े सर्जन के नाम थे डॉ. माइकल डेबेके और डॉ. कूली।
Subscribe to:
Posts (Atom)