ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों सहित एक अंतरराष्ट्रीय दल ने एक नए तारामंडल के दस नए ग्रहों की खोज की है। यह ग्रह हमारे सौर मंडल के कुछ ग्रहों से मिलते-जुलते हैं। उनमें से एक उस तारे की परिक्रमा कर रहा है जो केवल कुछ लाख साल ही पुराना है। दो नैप्चयून के आकार के ग्रह हैं जबकि एक शनि जैसा है लेकिन उससे थोड़ा छोटा है। सभी ग्रह हमारी सौर प्रणाली, एक्सोप्लेनेट्स के बाहर हैं। इन ग्रहों की खोज कोरोटी अंतरिक्ष दूरबीन से की गई है जिसका संचालन फ्रांसीसी अंतरिक्ष एजेंसी सीएनईएस करती है। ऑक्सफोर्ड में भौतिकशास्त्र की डॉ. सुजेन अग्रेन के अनुसार अगर हम ग्रहों के निर्माण की स्थिति को समझना चाहते हैं तो हमें उन्हें उनके अस्तित्व के कुछ लाख साल में ढूंढना होगा। जो ग्रह नेपच्यून की तरह हैं उनके बारे में उनका कहना है कि पहला धरती से तीन गुना बड़ा है और तारे की परिक्रमा में 5.1 दिन लेता है। दूसरा धरती से 4.8 गुना बड़ा है और 11.8 दिन परिक्रमा में लेता है। इस लिहाज से यह ग्रह आकार में नेपच्यून के आकार के हैं लेकिन उससे कहीं अधिक गर्म हैं। इतने अच्छे उपकरणों के बावजूद हम उनके द्रव्यमान की ऊपरी सतह का ही पता लगा पाए हैं। इसके बावजूद यह पता लगाने के लिए यह काफी है कि उनका घनत्व बृहस्पति से अधिक नहीं है जिसका मतलब है कि उनमें अधिकतर गैस है। उसमें काफी मात्रा में पत्थर और बर्फ भी हो सकती है।
Showing posts with label पृष्ठ संख्या १४. Show all posts
Showing posts with label पृष्ठ संख्या १४. Show all posts
Wednesday, June 29, 2011
Wednesday, June 15, 2011
सिकुड़ रहा है मानव का मस्तिष्क!
इस धारणा के विपरीत कि मानव पहले से लंबा हुआ है, एक नए शोध में पता लगा है कि आदमी का कद छोटा हो रहा है और उसका मस्तिष्क भी सिकुड़ता जा रहा है। डेली मेल के अनुसार कैम्बि्रज विश्वविद्यालय के एक दल ने पाया कि शिकार के बाद मानव ने करीब 9000 साल पहले कृषि करना शुरू किया। इससे भोजन तो काफी मिलने लगा लेकिन खनिजों और विटामिन की कमी होने लगी जिससे मनुष्य के विकास पर असर पड़ा। चीन में शुरू के मानव चावल और बाजरे जैसे अनाज पर निर्भर रहते थे जिसमें नियासिन (विटामिन बी) का अभाव होता था जो वृद्धि के लिए जरूरी है। लेकिन कृषि के बढ़ने से कैसे मस्तिष्क सिकुड़ना शुरू हुआ यह पता नहीं है। करीब 20000 साल पहिले पुरूष का मस्तिष्क 1500 क्यूबिक सेंटीमीटर था और आधुनिक मानव का मस्तिष्क 1350 क्यूबिक सेंटीमीटर है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका आशय यह नहीं है कि वह कम बुद्धिमत्तापूर्ण व्यक्ति बन गया है। बजाय इसके वह संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना सीख गया है। मानव ने अपनी ऊंचाई की सीमा तय कर ली है और आधुनिक मानव अपने शिकारी पूर्वज की तुलना में दस प्रतिशत छोटा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि कद काठी में यह कमी पिछले 10000 साल में आई है। इसके लिए उन्होंने कृषि, सीमित खानपान की आदत और शहरीकरण को जिम्मेदार ठहराया है जिसके कारण लोगों का स्वास्थ्य प्रभावित हुआ है और बीमारियां बढ़ी हैं। अफ्रीका, यूरोप और एशिया से मिले मानव अवशेषों के जीवाश्म के आधार पर यह नतीजा सामने आया है। अखबार ने मानव विकास मामले के विशेषज्ञ डॉ. मार्टा लाहर के हवाले से कहा कि 200000 साल पहले इथोपिया में इंसान आज की तुलना में अधिक बड़ा और अधिक हृष्ट-पुष्ट था। इजरायल की गुफाओं से मिले 120000 से 100000 साल पहले के जीवाश्म बताते हैं कि तब का इंसान आज की तुलना में अधिक लंबा और हृष्ट-पुष्ट था।
सूरज की लपटें बिगाड़ेंगी धरती पर संचार
अंतरिक्ष एजेंसी नासा की वेधशाला को सूरज की असाधारण लपटें नजर आईं हैं जो अगले कुछ दिनों में धरती पर उपग्रहीय संचार और ऊर्जा में बाधा डाल सकती है। इससे दो दिन बाद धरती पर आ सकता है मध्यम चुंबकीय तूफान। राष्ट्रीय मौसम सेवा के मुताबिक, सूरज में एक भीषण धमाका हुआ जिससे वहां विकिरण का तूफान आया। वर्ष 2006 के बाद ऐसा तूफान वहां नहीं देखा गया था। अधिकारियों को उम्मीद है कि आग की लपटें आज जरा नरम पड़ेंगी। वैज्ञानिक बिल मर्टाग ने कहा, यह जरा नाटकीय है। उन्होंने बताया कि मध्यम आकार की एम-2 लपटों को अंतरराष्ट्रीय समयानुसार पांच बज कर 41 मिनट पर आगे बढ़ता पाया गया। मर्टाग ने कहा, हमने शुरूआती लपटों को देखा। वे उतनी तेज नहीं थीं लेकिन धमाका बहुत तेज था। हमने उसमें विकिरण को भी पाया। हालांकि नासा ने कहा है कि पृथ्वी पर इस घटना का कम प्रभाव पड़ने की आशंका है। मर्टाग ने कहा, एक दो दिनों में हम उसका धरती पर असर पड़ने की उम्मीद कर रहे हैं और इससे यहां भू-चुंबकीय तूफान भी आ सकता है। उन्होंने कहा, इससे बहुत बड़ा नहीं बल्कि मध्यम तूफान पैदा हो सकता है। इससे धरती के गर्भ में हलचल होने की आशंका है। इस हलचल से वातावरण में कई तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं। नासा के बयान के अनुसार छोटे कणों के बड़े बादल बनने की उम्मीद है जिससे सौर क्षेत्र का आधे से ज्यादा हिस्सा ढंक जाएगा। मुर्ताघ का कहना है कि अंतरिक्ष विज्ञानी इस बात का अध्ययन कर रहे हैं कि सूर्य और धरती के बीच 150 मिलियन किलोमीटर की दूरी में चुंबकीय क्षेत्रों का कोई टकराव तो नहीं होगा। अब देखना यह है कि सूर्य से निकली गैस और चुंबकीय क्षेत्र कहीं पृथ्वी पर तो निशाना नहीं लगा रहा। माना जा रहा है कि एक-दो दिन में कोई तीव्र या मध्यम स्तर का सौर तूफान तो नहीं आ रहा।
Tuesday, June 14, 2011
परमाणु रिएक्टरों का रक्षक बनी गामा डोज लॉगर
भारतीय वैज्ञानिकों ने परमाणु रिएक्टरों और उनसे जुड़ी ईधन सुविधाओं के आस-पास के पर्यावरण में फैलने वाले विकिरण पर लगातार निगरानी रखने के लिए पहली बार स्वदेशी ऑनलाइन तकनीक विकसित की है। यह पर्यावरण में हो रहे हर प्रकार के परमाणु विकिरण पर नजर रखती है। इसे गामा डोज लॉगर तकनीक कहा जाता है। इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (आइजीसीएआर) के रेडियोलॉजी सुरक्षा और पर्यावरण समूह (आरएसईजी) के अधिकारी डॉ.बी.वेंकटरमण ने बताया कि इस तकनीक से सतत निगरानी द्वारा किसी अप्रिय घटना के होने से पहले अधिक रिसाव को तत्काल पकड़ा जा सकता है। यह प्रणाली आपातकालीन स्थिति के लिए भी उपयोगी है। उन्होंने बताया कि गामा डोज लॉगर प्रणाली सौर ऊर्जा से चार्ज हो रहीं बैटरियों पर काम करती है, इसलिए यह वातावरण की दृष्टि से भी अनुकूल है। तकनीक के लोकल एरिया नेटवर्क के जरिए हर वक्त रेडियोएक्टिव पदार्थो के उत्सर्जन और उसके बाद हो रही रासायनिक प्रतिक्रिया की वास्तविक स्थिति का भी पता लगाया जा सकता है। बेहतर ढंग से समझने के लिए इसमें ग्राफिकल डिस्प्ले भी देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि स्वेदश विकसित यह ऑनलाइन प्रणाली आयातित प्रणालियों की तुलना में कम से कम डेढ़ लाख रुपये सस्ती है और इसमें अतिरिक्त विशेषताएं भी हैं। उन्होंने कहा, बड़ी बात इस तरह की प्रणाली को स्वदेशी तौर पर विकसित करना है जिसका मतलब है उपलब्धता में विस्तार, आयात पर कम निर्भरता और सबसे अधिक महत्वपूर्ण है सुलभ उपयोगिता और देखभाल। आइजीसीएआर की ताजा विज्ञप्ति में वरिष्ठ वैज्ञानिक जी. सूर्य प्रकाश ने लिखा है, द रेडियोलॉजिकल सेफ्टी डिवीजन (आरएसडर) ने गामा डोज लॉगर तकनीक तैयार की है। इसमें अत्याधुनिक गामा ट्रेसर की क्षमताओं के साथ लैन के माध्यम से ऑनलाइन डाटा भेजने, संचार टॉवरों, डाटा सुरक्षा, किफायत और विस्तार क्षमता की जरूरत जैसी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता है।कलपक्कम परमाणु संयंत्र में चार जगहों पर सफलतापूर्वक इसे लगा दिया गया है। यह पिछले छह महीने से सुगमता और संतोषजनक तरीके से काम कर रही है।
Thursday, May 19, 2011
टाइटन पर स्थित मिथेन की झील में पहंुचेगी रोबोट-नाव
ब्रिटिश वैज्ञानिक अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के साथ मिल कर एक ऐसी मशीनी नाव बनाने की योजना बना रहे हैं जो शनि ग्रह के उपग्रह टाइटन पर स्थित मिथेन के भंडार में जीवन के निशान तलाशेगी। दी ऑब्जर्बर की खबर के अनुसार ओपेन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन जार्नेकी की अगुवाई में बने इस दल का कहना है कि इनकी यह नाव टाइटन के सतह पर स्थित मिथेन और इथेन के लीगिया मेर नाम के भंडार में उतरेगी। टाइटन मेर एक्सप्लोरर (टाइम) नाम के इस अभियान के जरिए कई महीनों तक टाइटन की सतह पर पड़ने वाली हवाओं और दबाव का अध्ययन किया जाएगा। टाइटन हमारे सौरमंडल का एकमात्र ऐसा उपग्रह है जिसके वातावरण में नाइट्रोजन और मिथेन गैसों की मोटी चादर मौजूद है। प्रो. जार्नेकी ने बताया, टाइटन पर तरंगें बड़ी होने के बावजूद महासागरों की तरंगों से काफी छोटी होती हैं। इस कारण सौरमंडल में यहां जाना काफी आसान है। एक दिक्कत बस यह है कि वहां का तापमान शून्य से 180 डिग्री सेल्सियस नीचे होता है। उन्होंने बताया कि टाइटन पर अत्यधिक ठंड के कारण ही धरती पर गैस के रूप में मौजूद मिथेन वहां द्रव्य के रूप में पाई जाती है। टाइटन अकेला ऐसा चंद्रमा है जिसका अपना वातावरण है और वह नाइट्रोजन और मीथेन का बना हुआ है। इसीलिए धरती के अलावा किसी समुद्र में यह अभियान अपनी तरह का पहला होगा। जिस तरह धरती पर पानी गैस, तरल व ठोस तीनों ही रूपों में पाया जाता है, ठीक उसी तरह टाइटन पर मीथेन तीनों रूपों में मौजूद है। मीथेन टाइटन की सतह और वातावरण के बीच एक चक्र के रूप में संतुलन का काम भी करता है जिस तरह धरती पर पानी करता है। वह वहां के वातावरण को बदलकर प्रभावित करता है। सूर्य से आने वाले अल्ट्रवायलेट किरणें मीथेन से रासायनिक क्रिया करके जटिल तरल कार्बन बनाती हैं जो सतह पर बहने लगता है। इससे टाइटन पर पेट्रो केमिकल्स की वर्षा होती है। इन पेट्रो केमिकल्स पदार्थो से भरी नदिया आसपास सबकुछ बहाकर झीलों का निर्माण करती हैं। टाइम प्रोब को अंतरिक्ष यान के जरिए सौरमंडल की अरबों मील की यात्रा के बाद टाइटन पर छोड़ दिया जाएगा।
धरती के पास से जाते हैं ब्लैकहोल
ग्रहों पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि हर रोज कई छोटे आकार के ब्लैकहोल बिना नुकसान पहुंचाए धरती के पास से गुजर जाते हैं। आमतौर पर माना जाता है कि ब्लैकहोल बहुत विशाल और विनाशकारी होते हैं लेकिन नई खोज से साफ हो गया है कि नन्हें ब्लैकहोलों से पृथ्वी को खतरा नहीं है। प्रतिवर्ष धरती के पास से शांतिपूर्वक गुजर जाने वाले ब्लैक होल अक्सर अपनी कक्षा में आने वाली वस्तुओं को ही अपने में आत्मसात करते हैं। जिसतरह किसी परमाणु के नाभिकीय को न छेड़ते हुए वह इलेक्ट्रान के माफिक मंडराते रहते हैं। अध्ययन के मुताबिक नन्हें ब्लैक होल इतने निष्प्रभावी होते हैं कि वह पृथ्वी पर रह भी सकते हैं और उसे बिना कोई हानि पहुंचाए उसके पास से गुजर भी जाते हैं। बड़े ब्लैक होल अपने आसपास तो क्या धुरी पर आने वाले ग्रहों तक को निगल जाते हैं जबकि नन्हें ब्लैक होल गुरुत्वाकर्षण बल बहुत सीमित होता है। कैलिफोर्निया के हेल्सियन मॉलिक्यूलर के आरोन पी. वैनडेवेंडर और न्यूमेक्सिको के सांदिया राष्ट्रीय प्रयोगशाला के जे पेस वैनडेवेंडर ने इस शोध दल का नेतृत्व किया है। डेलीमेल की खबर के अनुसार शोध में कहा गया है कि यह छोटे ब्लैकहोल वस्तुओं को कक्षा में स्थापित किए रहते हैं, ठीक उसी तरह जैसे इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर कक्षा में मौजूद रहते हैं। गौरतलब है कि सामान्य तौर पर बड़े आकार के ब्लैकहोल अपने पास से गुजरने वाली रौशनी समेत हर वस्तु को निगल जाते हैं। इनका निर्माण विशाल तारों के आपस में टकराने से होता है। वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया के सिद्धांत को परमाणु के समतुल्य गुरुत्वाकर्षण का नाम दिया है। एआरएक्सआईवी. ओआरजी वेबसाइट पर प्रसारित किए गए इस शोध में वैज्ञानिकों ने कहा है, इस तरह के ब्लैकहोल को ढ़ूंढ़ना मुश्किल तो है पर नामुमकिन नहीं। वैनडेवेंडर्स के अनुसार उनमें एक अणु के जितना गुरुत्वाकर्षण बल होता है। उनकी गणना के अनुसार लाखों किलोग्राम के नन्हें ब्लैकहोल प्रतिवर्ष धरती के पास से गुजर जाते हैं। लेकिन वह धरती का कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं।
Thursday, April 28, 2011
जुगाली से जलेंगे चूल्हे, दौड़ेंगी गाडि़यां!
अगर यह अनुसंधान व्यावहारिक पैमानों पर खरा उतरा तो देश के डेयरी फार्मो के लाखों मवेशी दूध और मांस के उत्पादन के साथ ईधन बनाने में भी मददगार साबित होंगे। इससे वातावरण की हिफाजत होगी, सो अलग। इंदौर जिले के शासकीय पशु चिकित्सा महाविद्यालय से स्नातकोत्तर स्तर पर अनुसंधान कर रहे जुल्फकार उल हक ने मवेशियों की जुगाली के दौरान निकलने वाली मीथेन गैस को संग्रहित करके इसे तरल ईधन में बदलने की परियोजना का खाका खींचा है। उन्होंने बुधवार को बताया, मैं जिस डेयरी फार्म की परिकल्पना को आकार देने की कोशिश में जुटा हूं, उसमें मवेशियों को आहार दिए जाने के बाद उनके मुंह पर विशेष नलियां लगा दी जाएंगी। हक ने बताया कि ये नलियां पशुओं की जुगाली और डकार के दौरान निकलने वाली मीथेन गैस को जमा करेगी, जिसे एक चैंबर में पहुंचाकर तरल ईधन में बदल दिया जाएगा। मीथेन उन ग्रीनहाउस गैसों में शामिल है, जिनकी ग्लोबल वॉर्मिग बढ़ाने में अहम भूमिका मानी जाती है। हक ने कहा, तरल मीथेन को ईधन के रूप में वाहनों और खाना पकाने में इस्तेमाल किया जा सकता है। चूंकि देश में मवेशियों की आबादी दुनिया के दूसरे मुल्कों के मुकाबले बेहद ज्यादा है। लिहाजा, इस तरह की परियोजना से ग्लोबल वॉर्मिग पर नियंत्रण में भी मदद मिलेगी। हक ने बताया कि एक अनुमान है कि जुगाली करने वाला मवेशी आमतौर पर दिन भर में 250 से 500 लीटर मीथेन वातावरण में छोड़ सकता है। लिहाजा इस बारे में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय खासा चिंतित है। उन्होंने बताया कि उनकी परिकल्पना को इंडियन एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ वेटरनरी रिसर्च (आइएएवीआर) के जयपुर में फरवरी के दौरान राष्ट्रीय अधिवेशन में सर्वश्रेष्ठ नवाचारी विचार के रूप में पुरस्कृत किया जा चुका है। युवा अनुसंधानकर्ता इन दिनों अपनी परिकल्पना को परिष्कृत और व्यावहारिक रूप देने में जुटा है|
Monday, April 11, 2011
प्रयोगशाला में बनाई किडनी
वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने प्रयोगशाला में स्टेम कोशिकाओं की मदद से गुर्दा (किडनी) तैयार कर लिया है। इस विकास को चिकित्सा जगत में बड़ी सफलता माना जा रहा है। इसके बाद अब प्रत्यारोपण के लिए इस अंग की कमी से निपटने में मदद मिलेगी। स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग विश्वविद्यालय के एक शोध दल को यह अभूतपूर्व कामयाबी मिली है। स्टेम कोशिकाएं शरीर के निर्माण में बेहद अहम भूमिका निभाती हैं। द स्कॉट्समैन की खबर के अनुसार, प्रयोगशाला में बनकर तैयार इस अंग की लंबाई भू्रण में गुर्दे के आकार के बराबर यानी आधा सेंटीमीटर है और इसे बनाने वाले दल को उम्मीद है कि यह छोटा सा गुर्दा मानव शरीर में प्रत्यारोपित होने के बाद बढ़कर सामान्य गुर्दे के बराबर हो जाएगा। यहां तक कि इस गुर्दे को तैयार करने में अमीनियोटिक द्रव्य की कोशिकाओं का प्रयोग किया गया है। यह द्रव्य गर्भ में बच्चे के चारों ओर फैला रहता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चे के जन्म के समय चिकित्सक इस द्रव्य को एकत्रित कर सकते हैं और तब तक संचित रख सकते हैं जब तक गुर्दे की बीमारी वाले मरीज को इसकी जरूरत नहीं पड़ती। नए गुर्दे के निर्माण के लिए व्यक्ति की खुद की अमीनियोटिक द्रव्य कोशिकाएं इस्तेमाल की जा सकती हैं। ऐसा करने से उस समस्या का भी अंत होगा जब किसी मृतक देनदाता के अंग का इस्तेमाल करने को लोग खारिज कर देते हैं। इस दल के प्रमुख प्रोफेसर जैमी डेवीस ने कहा कि सोच यह थी कि मानव स्टेम कोशिकाओं से शुरुआत की जाए और कार्यशील अंग पर खत्म। अगर आपके पास टेस्ट ट्यूब में स्टेम कोशिकाओं का गच्च्छा मौजूद हो तो इसे जटिल गुर्दे जैसा अंग बनने में बेहद लंबा सफर तय करना होगा। उन्होंने कहा कि इसलिए हम इस पर काम कर रहे हैं कि कैसे तरल में तैरती कोशिकाओं को आप कुछ ऐसे व्यवस्थित करते हैं कि वह गुर्दे के रूप में तब्दील हो जाएं। उन्होंने कहा कि हमने इस संबंध में काफी अच्छी प्रगति की है। हम कुछ ऐसा बना सकते हैं जो जटिलता के मामले में सामान्य भ्रूणीय गुर्दे जैसा हो मगर अभी तक परिपक्व नहीं हुआ हो। मानव में इस गुर्दे का प्रत्यारोपण संभव बनाने के लिए स्कॉटलैंड और अमेरिका के शोध दल विभिन्न तकनीकों पर काम कर रहे हैं। मिशिगन के दल ने भ्रूणीय स्टेम कोशिकाओं को गुर्दे की स्टेम कोशिकाओं में बदलने के लिए रसायनों का प्रयोग किया|
अब चांद पर खनन की तैयारी!
कंपनियां अब धरती के साथ-साथ चांद पर भी कारोबार के लिए संभावनाएं तलाश रही हैं। इसी कड़ी में भारतीय मूल के एक कारोबारी की ओर से स्थापित कंपनी ने चंद्रमा पर खनन की योजना बनाई है और इसके लिए एक विशेष रोबोट का निर्माण किया जा रहा है, जो इस उपग्रह पर संभावित खनिज पदार्थो का पता लगाएगा। मून एक्स नामक इस कंपनी की बुनियाद भारतीय मूल के कारोबारी नवीन जैन ने रखी थी। वह नासा के एमेस रिसर्च सेंटर के साथ मिलकर रोबोट का निर्माण कर रही है। समाचार पत्र लॉस एंजिल्स टाइम्स के मुताबिक जैन ने कहा, इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि चांद पर खनिज संपदा है, हालांकि मून एक्स का मानना है कि वहां सोने की खदान हो सकती है। उन्होंने कहा, एक कारोबारी के नजरिए से देखें तो चंद्रमा पर मौजूद संसाधानों को लेकर कभी सही ढंग से पड़ताल नहीं की गई। हमारा मानना है कि वहां ऐसे संसाधन हो सकते हैं, जो पृथ्वी और पूरी मानवता के लिए फायदेमंद हों। खबर में लिखा गया है कि मून एक्स की मशीनों को ऐसे खनिज ढूंढ़ने के लिए डिजाइन किया गया है जो धरती पर तो कम मात्रा में हैं मगर क्रूज मिसाइल से लेकर कार बैटरी तक सब जगह पाए जाते हैं। जैन ने कहा, मून एक्स को वर्ष 2013 तक चंद्रमा की सतह पर उतरने के लिए तैयार रहना चाहिए। वहां सबसे पहले पहंुचना हमारा लक्ष्य है। मून एक्स में नासा के पूर्व इंजीनियरों सहित कुल 25 लोग काम करते हैं। कंपनी को नासा से एक करोड़ डॉलर का ठेका मिला है। यह कंपनी कई अन्य कंपनियों के साथ गूगल ल्यूनर एक्स पुरस्कार जीतने की होड़ में है। तीन करोड़ इनामी राशि वाली इस प्रतियोगिता को जीतने के लिए चंद्रमा की सतह पर सबसे पहले अपने रोबोट को उतारना होगा। यह रोबोट कम से कम एक मील के एक तिहाई हिस्से तक खनन में सक्षम होना चाहिए और 2016 से पहले उच्च्च गुणवत्ता वाले वीडियो और तस्वीरों को धरती पर भेज दे। जैन ने कहा कि निजी खर्चे पर चांद पर खनन के लिए संसाधन जुटाना ज्यादा चिंता की बात नहीं हैं। उन्होंने कहा, मैं यह भी सोचता हूं कि हमारे महासागरों के जल की तरह ही चंद्रमा के साथ भी भिन्न बर्ताव नहीं किया जाएगा। ऐसे मामले में, जल पर किसी का अधिकार नहीं होता मगर कोई भी कंपनी या देश कुछ निश्चित सुरक्षा या नैतिक दिशा निर्देशों को ध्यान में रखते हुए अंतरराष्ट्रीय जल से संसाधनों का खनन कर सकता है|
Wednesday, April 6, 2011
जीवन का चौथा रूप खोजा!
धरती पर लंबे समय से जीवन के चौथे रूप के अस्तित्व को लेकर जीव विज्ञानियों के बीच बहस चल रही है। अब जाकर अमेरिकी वैज्ञानिकों को धरती पर जीवन के चौथे रूप की मौजूदगी के ठोस प्रमाण मिले हैं। उल्लेखनीय है कि धरती पर जीवों को अभी तीन रूप में विभाजित किया गया है। पहले जटिल शारीरिक रचना वाले जानवर, मनुष्य, पेड़-पौधे, दूसरे बैक्टीरिया और तीसरे आर्किया हैं। इनमें आखिरी दो सूक्ष्मजीवियों में आते हैं। अब कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में जीवविज्ञान के प्रोफेसर जोनाथन ईसेन ने दावा किया कि उन्होंने चौथी श्रेणी को खोज लिया है। उन्होंने अपने साथी शोधकर्ता डॉ. क्रेग वेंटर द्वारा दुनिया के दौरे पर इकट्ठे किए गए डीएनए के अध्ययन के लिए जटिल जीन संरचना तकनीकी का इस्तेमाल किया। उन्होंने पाया कि डीएनए के इन नमूनों में मौजूद जीन जीवन के मौजूदा तीनों रूपों में से किसी से मेल नहीं खाते। उनका कहना है कि ये जीन किसी चौथे जीव के हो सकते हैं। नए डीएनए को जीवन के किसी भी वर्ग में डालने के प्रयास में असफल साबित होने पर प्रोफेसर ईसेन ने अपने तथ्यों को पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ साइंस पत्रिका में प्रकाशित किया है, ताकि अन्य वैज्ञानिक अपनी जानकारियों के साथ इस काम में मदद के लिए आगे आएं। सवाल यह है कि ये डीएनए कहां से आए? क्या ये किसी अलग प्रकार के वायरस से ताल्लुक रखते हैं? अगर ऐसा है तो जीवन के चौथे रूप का अस्तित्व अपने आप में काफी रोचक है। सबसे बड़ी बात यह है कि ये जीवन वृक्ष की एकदम नई शाखा का का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। प्रोफसर ईसेन के हवाले से द डेली टेलीग्राफ ने लिखा है, हालंाकि अभी तक हमें इसके पीछे की पूरी कहानी मालूम नहीं पड़ी है। आखिर में हमने तय किया कि इस अध्ययन को प्रकाशित कराया जाए ताकि अन्य लोग भी इस मामले पर विचार कर सकें। इन नए जीन का अध्ययन करने में कठिनाई इनके अल्प मात्रा में उपलब्ध होने के कारण आ रही है। मगर डॉ. वेंटर के तरीके का इस्तेमाल कर ईसेन ने मानव जनेटिक कोड को पढ़ने का सफल प्रयास किया। उन्होंने इस तकनीक को मेटाजीनोमिक्स नाम दिया है। इसके तहत डीएनए को टुकड़ों में विभाजित कर दिया जाता है और उनको डिकोड कर लिया जाता है। इसके पश्चात इन्हें सही क्रम में फिर से व्यवस्थित कर दिया जाता है। सस्ते और शक्तिशाली कंप्यूटरों के कारण विज्ञान को बड़ा फायदा पहुंचा है। डॉ. वेंटर द्वारा 2003 से 2007 के बीच दुनियाभर के समुद्रों से एकत्रित किए नमूनों पर शोधदल ने अपनी तकनीक को इस्तेमाल किया। प्रोफेसर ईसेन आरईसी ए और आरपीओ बी नामक दो जीनों पर अटक गए। ये दोनों पुराने और प्रचूर मात्रा में थे जिनकी विशेषताएं सार्वजनिक जनेटिक डाटाबेस से बिल्कुल अलग थीं। इस खोज के वर्गीकरण के लिए शोध जारी है मगर समस्या यह है कि यह जानकारी नहीं है कि ये जीन आखिर आए कहां से। इन्हें सामान्य तौर पर लिए गए समुद्री जल के नमूनों से हासिल किया गया है|
Monday, April 4, 2011
पृथ्वी होगी मंदिर सी लाल
सुर्ख लाल और गर्म ग्रह मंगल हमेशा से ऐसा नहीं था। ताजा वैज्ञानिक अनुमान यही है। इस पर भी सनसनीखेज वैज्ञानिक दावा यह है कि मंगल के लाल रंग का होने की वजह वहां लाखों साल पहले हुआ परमाणु विस्फोट है। यानी अगर जीवनदायिनी धरती पर भी ऐसे ही परमाणु धमाके हुए यह तो यह भी निर्जन और लाल रंग की हो जाएगी। डॉ. जॉन ब्रैंडेनबर्ग का मानना है कि 1800 लाख साल पहले संभवत: किसी ग्रह के टकराने से वहां प्राकृतिक रूप से अत्यधिक भीषण परमाणु विस्फोट हुए जिससे वहां सब कुछ तहस-नहस हो गया। उससे उठे भीषण ताप और झटके से वहां सबकुछ सूखी रेत में तब्दील हो गया। उनका कहना है कि मंगल ग्रह की सतह पर रेडियोएक्टिव पदार्थो की एक पतली परत है। इसमें यूरेनियम, थोरियम और रेडियोएक्टिव पोटैशियम शामिल है। उन्होंने फॉक्स न्यूज को बताया कि इस पदार्थो के साथ ही सतह पर एक जगह लाल धधकता हुआ विशालकाय धब्बा है। उनका मानना है कि यह परमाणु कण इसी धब्बे से ग्रह की पूरी सतह पर फैले हैं। उनका अनुमान है कि किसी परमाणु विस्फोट से उसका सारा मलबा पूरे ग्रह की सतह पर फैल गया होगा। मंगल ग्रह पर गामा किरणों से मिले नक्शे के अनुसार ग्रह पर एक बड़ा लाल धब्बा है। इन गामा किरणों की मदद से पता चलता है कि परमाणु विकिरण का केंद्र यही धब्बा है। आर्बिटल टेक्नोलॉजीस कॉर्प के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. ब्रैंडनबर्ग के अनुसार प्राकृतिक परमाणु विस्फोट तकरीबन दस लाख एक मेगाटन हाइड्रोजन बम विस्फोटों के बराबर रहा होगा। यह विस्फोट मंगल ग्रह के उत्तरी मेर एसिडेलियम क्षेत्र में हुआ होगा। इसीलिए यहां पर भारी मात्रा में परमाणु विकिरण देखा जा सकता है। उन्होंने बताया कि इन्हीं धमाकों के कारण इस क्षेत्र में रेडियो तरंगों के थक्के बन गए। जिन्हें कि हाल में नासा के मंगल ग्रह पर गामा किरणें डालकर उसकी परतों के आंकड़े एकत्र करने के दौरान पाया गया। इस रेडियोधर्मिता से यह भी साफ हो जाता है कि मंगल ग्रह लाल रंग का क्यों दिखता है। नासा के एकत्र किए इन आंकड़ों के आधार पर डॉ. ब्रैंडनबर्ग का सिद्धांत यह है कि इस प्राकृतिक परमाणु विस्फोट के चलते ही मंगल ग्रह उजड़ गया और वहां पर मौजूद हर चीज खत्म हो गई। उनका मानना है कि कभी पृथ्वी पर भी ऐसा ही प्राकृतिक परमाणु विस्फोट संभवत: होता तो सबकुछ खत्म हो जाता। यानी पृथ्वी भी मंगल ग्रह जैसी वीरान और लाल रंग की हो जाएगी। नासा के जेट प्रोपुलजन के मंगल ग्रह कार्यक्रम के साइंस मैनेजर डॉ. डेविड बेटी का कहना है कि यह अवधारणा बहुत ही तार्किक है कि लेकिन पुख्ता वैज्ञानिक आधार के लिए मंगल ग्रह के मेर एसिडेलियम क्षेत्र में एक अभियान भेजना होगा। पहली बार वैज्ञानिकों ने मंगल ग्रह पर जीवन की संभावना ढूं्ढने के बजाय वहां पर हुए विनाश की थ्योरी पर काम किया है। हो सकता है इससे ही जीवन के संकेत भी साफ हो सकें|
Monday, March 28, 2011
दिल की बिन चीरा सर्जरी
भारतीय मूल के एक डॉक्टर के नेतृत्व में ब्रिटेन के चिकित्सकों के दल ने एक नई तरह की हार्ट सर्जरी करने में सफलता हासिल की है। यह पद्धति ओपन हार्ट सर्जरी कराने में अक्षम मरीजों के लिए जीने की एक नई आस है। इस ऑपरेशन से मरीज के शरीर में एक छोटे से छेद के जरिये उसके हार्ट वॉल्व को बदला जा सकता है। और यह चमत्कार बस एक घंटे में हो जाएगा। इस पद्धति को ट्रांसकैथेटेरोएर्टिक वॉल्व इंप्लान्टेशन (टीवीएआइ) नाम दिया गया है। दल का नेतृत्व कर रहे गाय्ज एंड सेंट थॉमस हॉस्पिटल के डॉक्टर विनायक बापट के हवाले से डेली मेल ने कहा, टीवीएआइ उन मरीजों के लिए वरदान है, जो गंभीर रूप से बीमार और कमजोर होने के कारण हार्ट सर्जरी कराने में अक्षम है। यह पद्धति काफी सस्ती और सरल है, जिसमें मरीज के सीने या जांघ में एक छोटा सा चीरा लगा कर हार्ट वॉल्व को बदला जा सकता है। टीवीएआइ के इस ऑपरेशन के बाद मरीज चार से छह दिनों में घर वापस जा सकता है जबकि ओपन हार्ट सर्जरी के बाद मरीज को दस दिन तक अस्पताल में बिताना पड़ते हैं। पैपवर्थ अस्पताल में इस पद्धति से इलाज कराने वाले यूरोप के पहले व्यक्ति 54 वर्षीय जॉन क्रोनिन ने कहा, टीवीएआइ ने मेरी जान बचा दी। पहले मैं छोटे से छोटा काम करने में बुरी तरह से हांफ जाता था, लेकिन अब मैं आसानी से साइकिल भी चला पाता हूं। एरोटिक स्टेनोसिस नामक दिल के वाल्व को बंद करने वाली यह बीमारी काफी आम है। यह कई दफा बचपन से ही दिल में गतिरोध होने के बावजूद बुढ़ापे में उभरती है। हृदय के प्रमुख एरेटिक वाल्व में कैल्शियम बनने से यह उत्पन्न होती है जिससे दिल में रक्त का प्रवाह कम हो जाता है। अब तक बाईपास सर्जरी के जरिए मरीज के सीने में चीरा लगाकर उसके दिल को एक बाईपास मशीन पर सेट कर दिया जाता है और उस दौरान खराब हो चुका एरोटिक वाल्व बदल दिया जाता है। हालांकि नई पद्धति में मरीज की जांघ या दिल में एक नन्हा से छेद करके एक बहुत बारीक स्टेनलेस स्टील की पत्ती डाली जाती है। इसके सिरे पर गाय के दिल के ऊतक लगे होते हैं। इसके दूसरे सिरे पर एक गुब्बारा होता है। यह गुब्बारा एक तरह से वाल्व का काम करता है। गाय का यह ऊतक बहुत नरम होता है जो मृत गाय के दिल से तुरंत निकालकर मरीज के इस ऑपरेशन में इस्तेमाल होता है|
Wednesday, March 23, 2011
ज्वालामुखी ने डाली थी जीवन की नींव
ज्वालामुखी विस्फोट और बिजली की कड़क भले ही दिल दहलाने वाली होती है, लेकिन इनके जरिये ही पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत हुई है। एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है। जिसे प्रोसीडिंग ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस की पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। डेली मेल के अनुसार, सेन डियागो स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ता अमेरिकी प्रोफेसर स्टेन्ले मिलर के पांचवें दशक में किए गए एक शोध में पाए गए प्री-मोर्डियल सूप गैस के नमूनों पर आधुनिक तकनीक के जरिये पुन: विश्लेषण करने के बाद इस नतीजे पर पहुंचे हैं। दल का नेतृत्व कर रहे कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और स्टेन्ले के छात्र रहे जेफरी बाडा ने कहा, हमारे शोध में पाया गया अमीनो एसिड स्टेन्ले के नमूनों से काफी बेहतर है, ये हमारे 2008 से चल रहे अध्ययन को बढ़ाने के साथ साथ यौगिकों की विविधता को भी प्रभावित करेगा, जिसे हम किसी निश्चित गैसीय मिश्रण से प्राप्त कर सकते है। बाडा ने एक हजार गुना अधिक संवेदनशील तकनीक का इस्तेमाल कर जीवन के लिए आवश्यक अमीनो एसिड की श्रृंखला का पता लगाया है। प्रोफेसर स्टेन्ले ने 1953 में एक शोध में पृथ्वी पर जीवन के शुरुआत के पहले (लगभग 40 करोड़ साल) की वायुमंडलीय परिस्थिति बनाने की कोशिश थी। स्टेन्ले ने मिथेन, अमोनिया, वाष्प और हाइड्रोजन के मिश्रण में विद्युत तरंग के जरिये अमिनो एसीड और दूसरे कार्बनिक यौगिक बनाने में सफलता हासिल की थी। हालांकि उन्हें जीवन के वास्तविक घटक प्री-मोर्डियल सूप को हासिल करने में पूरी तरह से कामयाबी नहीं मिल पाई थी। वर्ष 1958 में अपने दूसरे शोध में स्टेन्ले ने मिश्रण में ज्वालामुखी से निकलने वाली जहरीली गैस हाइड्रोजन सल्फाइड को मिलाकर एक निर्णायक कदम उठाया था। कोलंबिया विश्वविद्यालय में किए गए उनके शोध का विश्लेषण नहीं किया गया था। हालांकि इसके दस्तावेजों को संभालकर जरूर रखा गया था। प्रोफेसर बाडा के परिणामों में कार्बनिक यौगिकों की प्रचूरता का खुलासा हुआ। इनमें 23 अमीनो एसिड भी शामिल थे। एक श्रृंखला में जुड़े करीब 20 अमीनो एसिड प्रोटीन बनाते हैं जो सभी जीवित प्राणियों के लिए कार्बनिक तंत्र और कोशिका निर्माण के लिए सामग्री उपलब्ध कराता है। अमीनो एसिड की प्रचूरता प्रोफेसर मिलर के वास्तविक प्रीमोर्डियल सूप प्रयोग और दो इसके अगले अध्ययनों में उत्पादित अमीनो एसिड से ज्यादा थी। अध्ययन के परिणाम इस बात का समर्थन करते हैं कि जीवन की उत्पत्ति में ज्वालामुखियों की अहम भूमिका थी। ज्वालामुखी विस्फोट से काफी मात्रा में हाइड्रोजन सल्फाइड और बिजली की कड़क निकलती है। जब पृथ्वी अपनी युवावस्था में थी तब इस तरह की घटनाएं बेहद आम थीं। बाडा ने यह भी पाया कि स्टेन्ले के नमूनों में मौजूद अमीनो एसिड उल्का पिंडों में मौजूद अमिनो एसिड जैसे ही हैं, जिससे संकेत मिलता है कि हाइड्रोजन सल्फाइड के निर्माण की प्रक्रिया ने पूरे सौरमंडल में जीवन के बीज बोने में मदद की होगी|
Subscribe to:
Posts (Atom)