Saturday, January 15, 2011

विज्ञान और विकास की अनोखी राहें

नोबेल पुरस्कार विजेता वेंकी ने कुछ शब्दों में ही विज्ञान का सार समझा दिया। उनकी मान्यता है कि हम सब जन्मजात वैज्ञानिक हैं, लेकिन जैसे- जैसे बड़े होते हैं, हम वैज्ञानिक बनना भूल जाते हैं। बालक- पेड़-पौधों, कीड़े-मकोड़े, नीले आकाश और लाल सूरज के बारे में उत्सुक रहते हैं। बच्चों द्वारा पूछे गए सवालों पर माता-पिता उन्हें टरका देते हैं। यह ठीक नहीं है। जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हम नीले आकाश को देखते रहते हैं और प्रश्न करने से कतराते हैं
आप सब घर लौट आइये, देश को आपकी जरूरत है- यह संदेश प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने चेन्नई में 98वीं विज्ञान कांग्रेस का उद्घाटन करते हुए दिया। वे चाहते हैं कि युवा वैज्ञानिक देश लौटकर यहां के तकनीकी विकास और नए-नए कौशल में हाथ बंटाए। यहां अनेक सुविधाएं और अनुसंधान के साधन हैं। हमारे विविद्यालय विदेशों में अध्ययन कर रहे युवा वैज्ञानिकों के लिए अपने द्वार खोल सकते हैं, ताकि वे अपने यहां रिसर्च करियर शुरू कर सकें। अब समय आ गया है, जब भारतीय विज्ञान और टेक्नोलॉजी कुछ ऊंचा सोचे और समय से आगे बढ़े। अब समय आ गया है कि हम 21वीं शताब्दी के रामानुजन और रामन पैदा कर सकते हैं। विज्ञान कांग्रेस अपने शताब्दी वर्ष (2012-2013) में वैज्ञानिक शोधकर्ताओं में एकदम नया प्रोफाइल ला सकती है, जिससे देश का नक्शा ही बदल जाए और नए अवसर पैदा किए जा सकें। प्रधानमंत्री चाहते हैं कि देश में विज्ञान जो अब तक नहीं कर पाया है वह करके दिखाए। हमारे अनुसंधान से नए-नए प्रोडक्ट बनाए जा सकते हैं। हमारे इनोवेशन से ऐसी चीजें बनाई जा सकती हैं, जो बाजारों में बिक सकें और यहां तक कि हम इनका निर्यात कर सकें। सर सीवी रामन के आविष्कार 80 वर्ष बाद भी हमारे
इस्तेमाल में आ रहे हैं, और हम नई चीजें बनाए जा रहे हैं। हमारे प्रवासी वैज्ञानिक नई तकनीकों और आविष्कारों पर काम कर सकते हैं। वे विज्ञान और विकास की नई राहें खोल सकते हैं। ऐसी बात नहीं है कि भारत में विज्ञान की प्रगति के लिए अब तक कोई प्रयत्न नहीं किए गए हैं। 10 से 27 वर्ष के साढ़े तीन लाख से ज्यादा छात्रों को विज्ञान की पढ़ाई आगे बढ़ाने के लिए छात्रवृत्ति दी गई है। विज्ञानमंत्री कपिल सिब्बल ने घोषणा की है कि विदेश के बड़े से बड़े विविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों की तर्ज पर जल्द ही भारत के पास नवरत्न विविद्यालय होंगे जो सरकार के नियंतण्रसे मुक्त होंगे। केंद्रीय सरकार आधुनिक तथा विज्ञान टेक्नोलॉजी के नए-नए अंगों को आगे बढ़ाने के लिए एक वैज्ञानिक तथा इनोवेटिव रिसर्च एकेडमी स्थापित करेगी। देखना यह पड़ेगा कि नई-नई प्रयोगशालाएं और एकेडमी स्थापित होने से कहीं हमारी पहले की प्रयोगशालाएं अपना काम ठीक से न कर पाएं। उनका कोई महत्व ही न रहे। इसलिए नई-पुरानी प्रयोगशालाओं और संस्थानों में तालमेल बैठाना जरूरी है। नोबेल पुरस्कार विजेता अमत्र्य सेन का विज्ञान कांग्रेस में यह विचार सबसे सराहा गया कि ज्ञान और सद्भावना के लिए यह जरूरी है कि प्राचीन नालंदा विविद्यालय को पुनर्जीवित किया जाए। नालंदा की स्थापना बिहार में पांचवीं शताब्दी में की गई थी और यह 12वीं शताब्दी तक रहा, लेकिन इसे 1193 में हमलावरों ने नष्ट कर दिया गया। अब हम इसे पुनस्र्थापित करने के लिए चीन, सिंगापुर, और जापान सहायता दे रहे हैं। डॉ. सेन नालंदा विविद्यालय के बोर्ड के अध्यक्ष है। डॉ. अमत्र्य सेन विज्ञान कांग्रेस में नालंदा और विज्ञान शोध व अध्ययन पर भाषण दे रहे थे। उन्होंने बताया कि नालंदा का उद्देश्य ज्ञान और सद्भावना को बढ़ावा देना था। पूर्व में यहां 10 हजार छात्र और शोधकर्ता रहते थे। यहां धर्म और विज्ञान का अद्भुत मिशण्रथा। विज्ञान कांग्रेस में आए वैज्ञानिकों और नोबेल पुरस्कार विजेताओं में प्रसिद्ध रसायनिक वेंकी रामकृष्ण भी थे, जिन्हें 2008 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। जब उन्हें विज्ञान कांग्रेस का स्वर्ण पदक प्रधानमंत्री ने दिया तो हषर्ध्वनि और तालियों से सारा वातावरण गूंज गया। बाल विज्ञान कांग्रेस का उद्घाटन करते हुए वेंकी ने छात्रों से बड़े प्यार से बातचीत की। पहले दो दिन तक वे मूवी स्टार्स की तरह भीड़ से घिरे रहे और उनका फोटो लेने के लिए सब उतावले हो गए। इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए डा. रामकृष्णन ने कहा कि वैज्ञानिक कोई फिल्म स्टार नहीं है। वे केवल वैज्ञानिक हैं, जो प्रयोगशालाओं में काम करते हैं। उन्हें मूवी और क्रिकेट स्टारों की तरह न समझा जाए। सबका अलग- अलग काम है। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि मैं किसी भी जगह 15 मिनट बोलता हूं और मेरा शेष समय समारोह की कार्रवाई में चला जाता है। विज्ञान, जिज्ञासा, टेस्टिंग और प्रयोगों से संबंधित है और वैज्ञानिक होने के नाते मैं ज्ञान का भंडार भर रहा हूं, न कि भारत के लिए क्रिकेट खेल रहा हूं। विज्ञान एक वि उद्यम है, जहां संसार के एक भाग में होने वाली खोजों का लाभ अन्य भागों में उठाया जाता है। यह ट्रैफिक दोतरफा होना चाहिए क्योंकि इस समय केवल पश्चिम से वैज्ञानिक बहाव भारत की ओर ज्यादा है। भारत को विज्ञान में आत्म-भरित होना चाहिए। छात्रों से उन्होंने कहा- मैं आपके साथ ईमानदार हूं। आप मुझसे असहमत होने के लिए स्वतंत्र है। यही विज्ञान है।
इस प्रकार वेंकी ने कुछ शब्दों में ही विज्ञान का सार समझा दिया। उनकी मान्यता थी कि हम सब जन्मजात वैज्ञानिक हैं, लेकिन जैसे-जैसे बड़े होते हैं, हम वैज्ञानिक बनना भूल जाते हैं। बालक- पेड़-पौधों, कीड़े-मकोड़े, नीले आकाश और लाल सूरज के बारे में उत्सुक रहते हैं। वे माता पिता से कुछ पूछते हैं तो वे बच्चों को टरका देते हैं। यह ठीक नहीं है। जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हम नीले आकाश को देखते रहते हैं और प्रश्न करने से कतराते हैं। जलवायु परिवर्तन से सब देशों को चिंता है और इससे कृषि पर भी दुष्प्रभाव पड़ रहा है। विज्ञान कांग्रेस में कृषि विशेषज्ञ डॉ. एम एस स्वामीनाथन ने बताया कि हम इससे कैसे बच सकते हैं। हमारी कृषि मानसून पर निर्भर रहती है, इसलिए हमें अपनी कृषि पण्राली उसी के अनुसार ढालनी होगी। मानसून के उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखना होगा। प्राचीन समय में जब सिंचाई नहीं थी, किसान बाढ़ और सूखा का सामना करने के लिए तैयार रहते थे। उस समय जलवायु-अनुकूल खेती होती थी और मिश्रित फसल उगाते थे। हमें चाहिए कि हम अपने प्राचीन और देशी कृषि ज्ञान के दस्तावेज तैयार करें, जिससे वे हमारे काम आ सके। यह अच्छा है कि देश में फसलों और मौसम पर आधारित 127 कृषि जलवायु क्षेत्रों की पहचान की गई है। इसलिए हमें अपनी कृषि पण्राली उसी के अनुसार ढालने के प्रयत्न तेज करने होंगे। हम हर क्षेत्र में जलवायु जोखिम प्रबंधन शोध एवं प्रशिक्षण केंद्र स्थापित कर सकते हैं। ये केन्द्र वैकल्पिक फसलीकरण नीतियां और प्रतिकूल परिस्थितियों को रोकने की विधियां विकसित कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन का जिक्र करते हुए केंद्रीय नियंतण्रबोर्ड के अध्यक्ष डा. गौतम ने कहा कि जो रसायन नुकसान पहुंचाते हैं, उनका इस्तेमाल हमें नहीं करना चाहिए। हमारे यहां इलेक्ट्रॉनिक और प्लास्टिक कचरा एक बड़ी समस्या बनते जा रहे हैं, जिसका समाधान हम नहीं कर पा रहे। देश में प्रतिवर्ष चार लाख टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा हो रहा है, और हम केवल 83 हजार टन का निपटान कर पा रहे हैं। यही हाल प्लास्टिक कचरे का है। भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान में अब तक अच्छी प्रगति की है, और इसका लाभ हम दूसरे देशों को भी दे रहे हैं। लघु उपग्रह केंद्र के निर्देशक डा. एलेक्स ने कहा कि छोटे उपग्रहों से हमें बहुत कुछ लाभ हो सकते हैं। ये उपग्रह संचार, मौसम और कृषि विज्ञान में बहुत उपयोगी हैं, इसलिए हमें इनका विकास करना चाहिए। पिछले 30 वर्ष में कम वजन के एक हजार से ज्यादा उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे गए हैं। इनसे महत्वपूर्ण सूचनाएं मिली हैं। एक कॉलेज के छात्रों ने ऐसा ही एक लघु उपग्रह बनाया है। भारतीय वैज्ञानिकों का एक दल भूकम्प अध्ययन के लिए महाराष्ट्र के कोयना क्षेत्र में जमीन से 8 किलोमीटर नीचे एक छोटी प्रयोगशाला स्थापित करेगा। भूकम्प की दृष्टि से यह क्षेत्र संवेदनशील है। यहां 20 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में भूकम्प आते रहते हैं। नई प्रयोगशाला से ज्ञान होगा कि भूकम्प आने से पहले और उसके दौरान क्या होता है। यह अच्छा है कि कोयना क्षेत्र में हाल में कोई बड़ा भूकम्प नहीं आया है। इस वर्ष विज्ञान कांग्रेस में एक नए उत्साह की झलक देखी गई। आगे की अनेक तैयारियां की गई हैं और प्रस्तावित योजनाओं को अमल में लाने के प्रयत्न होंगे। सफलता ही सबकी कुंजी है।

छात्रों ने बनाई दुनिया की सबसे तेज गति की सोलर कार

88 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से सोलर कार चलाकर छात्रों ने पुराना रिकार्ड तोड़ते हुए गिनीज र्वल्ड रिकार्ड में अपना नाम दर्ज किया
मेलबर्न। आस्ट्रेलियाई छात्रों ने सौर ऊर्जा से चलनेवाली दुनिया की सबसे तेज कार बनाने का दावा किया है। 88 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से सोलर कार चलाकर इन छात्रों ने पुराना रिकार्ड तोड़ते हुए गिनीज र्वल्ड रिकार्ड में अपना नाम दर्ज किया। इस कार का डिजाइन न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी के छात्रों ने किया है। इस सोलर कार ने यह रिकार्ड नोवरा स्थित नेवी के अल्बाट्रोस हवाई पट्टी पर बनाया। इसने इससे पहले सोलर कार द्वारा बनाए गए 79 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार के रिकार्ड को तोड़ा। सनस्विफ्ट आईवी नामक यह कार 25 किलोग्राम की बैटरी को सेलों से चार्ज करती है, हालांकि रिकार्ड बनाने के प्रयास में इसे हटा दिया गया था। सन स्विफ्ट प्रोजेक्ट के मैनेजर डेनियल फ्रीडमैन के मुताबिक, ‘यह यह रिकार्ड बुधवार सुबह 10.32 बजे गिनीज र्वल्ड बुक ऑफ रिकार्ड के अधिकारियों की मौजूदगी में बनाया गया, इसलिए यह आधिकारिक है। हमें इसके लिए बाकायदा सर्टिफिकेट भी मिला है। फ्रीडमैन के अनुसार कार के प्रदर्शन से इसे बनाने वाली छात्रों की टीम बहुत रोमांचित है और उम्मीद है कि लोगों की सौर ऊर्जा में दिलचस्पी बढ़ेगी। आईवी 1200 वॉट ऊर्जा पैदा करती है। यह ऊर्जा एक टोस्टर को चलाने जितनी है।

Thursday, January 13, 2011

सौर मंडल के बाहर मिला सबसे छोटा ग्रह

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के खगोलशास्ति्रयों ने सौर मंडल के बाहर अब तक का सबसे छोटा ग्रह खोजने में कामयाबी पाई है। यह ग्रह पृथ्वी की तरह चट्टानी है। मगर यह अपने सूर्य के अत्यधिक निकट है और इसलिए इसकी सतह का तापमान इतना ज्यादा है कि इस पर जीवन संभव नहीं है। इस ग्रह को केपलर 10 बी नाम दिया गया है। उल्लेखनीय है कि केपलर नासा का पहला मिशन है, जो अंतरिक्ष में सौरमंडल से बाहर पृथ्वी जैसे ग्रहों की तलाश कर रहा है। ऐसे ग्रहों की जहां पानी और हवा मौजूद हो। जहां जीवन की संभावनाएं हों। नासा की एक टीम के मुताबिक नए ग्रह की खोज मई 2009 से लेकर जनवरी 2010 तक अंतरिक्ष यान द्वारा जुटाए गए तथ्यों पर आधारित है। इस ग्रह का आकार धरती के आकार का 1.4 गुना ज्यादा है। एस्ट्रोफिजिकल पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक इस ग्रह का द्रव्यमान धरती के द्रव्यमान का 4.6 गुना ज्यादा है। इसका औसत घनत्व 8.8 ग्राम प्रति घन मीटर है। नासा के मोफेट फील्ड कैलिफोर्निया स्थित एमेस रिसर्च सेंटर की टीम प्रमुख नताली बैटला ने कहा, चट्टानी ग्रह के बारे में पहला ठोस सबूत तो यह है कि यह सूर्य जैसे एक तारे का चक्कर लगा रहा है। उन्होंने जोड़ा कि केपलर दल ने 2010 में छोटे ग्रहों को ढूंढ़ निकालने का वादा किया था और यह सफलता की शुरुआत है। उन्होंने कहा कि केपलर-10 बी का मिलना पृथ्वी जैसे ग्रह की खोज की दिशा में मील का पत्थर है। यह ग्रह अपने तारे यानी सूर्य का एक चक्कर 0.84 दिन में पूरा करता है। जितना बुध हमारे सूर्य से करीब है, उसके मुकाबले केपलर-10 बी अपने सूर्य 20 गुना करीब है।

Monday, January 10, 2011

चंद्रमा का केंद्र धरती के गर्भ सरीखा

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के वैज्ञानिकों ने अपने ताजा अध्ययन में पाया है कि चंद्रमा का केंद्र भी पृथ्वी के गर्भ जैसा ही है। अचरज की बात यह है कि यह खोज भी उन्होंने उस भूकंप मापक यंत्र की मदद से की जो करीब 40 साल पहले दुनिया के पहले मानव नील आर्मस्ट्रांग अपने चंद्र अभियान के दौरान चांद पर छोड़ गए थे। 1971 में अमेरिकी अंतरिक्ष यान अपोलो से चांद पर गए अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों ने कुछ भूकंप मापक यंत्र अध्ययन के लिहाज से वहीं छोड़ दिए थे। उन उपकरणों से मिले आंकड़ों पर भूकंप मापक तकनीकें आजमा कर अमेरिकी वैज्ञानिकों ने अपने ताजा अध्ययन से पता किया कि चांद पर धरती के गर्भ जैसा ही तरह केंद्र है। अब तक वैज्ञानिकों का मानना था कि चंद्रमा के अंदर का केंद्रीय भाग पूरी तरह से ठोस है और उसमें तरल पदार्थ भी है। अब के अध्ययन से यह साफ हो गया है कि चांद के गर्भ में ठोस लौह धातु है ही साथ ही उसके सबसे आंतरिक भाग में तरल पदार्थ भी है। यह तरल भाग भी लौह तत्व के मिश्रण वाला है। ताजा अध्ययन से पता चला है कि चांद का आंतरिक केंद्र 150 मील की त्रिज्या तक ठोस लौह तत्व है, उसके बाद 205 मील की त्रिज्या पर बाहरी केंद्र में लौह मिश्रित तरल पदार्थ है। इन आंकड़ों से पता चलता है कि पृथ्वी के चंद्रमा ने अपना एक अलग मजबूत चुंबकीय क्षेत्र बना लिया है। इसमें पृथ्वी के गर्भ से केवल इतना ही अंतर है कि पृथ्वी के केंद्र में लौह की गली हुई धातु 300 मील की त्रिज्या तक है। चंद्रमा के गर्भ में सल्फर जैसे हल्के तत्व की भी थोड़ी मात्रा है। अब अमेरिकी वैज्ञानिक इस अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर चांद की सतह से लेकर उसके गर्भ तक की और जानकारियां हासिल करने के लिए कई अहम रीसर्च करेंगे। इसमें उसकी सतह का बारीकी से अध्ययन और उसका तापीय इतिहास शामिल है।

Sunday, January 9, 2011

सिर्फ सोचने भर से चलेगा कंप्यूटर

फ्रांसीसी वैज्ञानिकों ने बनाया सॉफ्टवेयर, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में किया इसका प्रदर्शन
अब आपको अपने कंप्यूटर को कमांड देने के लिए अन्य आउटपुट साधनों का सहारा नहीं लेना पड़ेगा बल्कि आपके सोचने भर से आपका कंप्यूटर काम करने लगेगा। यहां भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में चल रहे तकनीक समारोह में फ्रांसीसी वैज्ञानिकों द्वारा विकसित उस सॉफ्टवेयर का प्रदर्शन किया गया जो आपके सोचने भर से आपके कंप्यूटर को संचालित करेगा। विचारों को कंप्यूटर कमांड से जोड़कर वैज्ञानिकों ने एक कल्पना को असलियत का जामा पहनाने का काम किया है। उन्होंने अपने इस प्रोग्राम का नाम ओपन वाइब दिया है, जो एक तरह से आपके दिमाग को पढ़ कर कंप्यूटर को कमांड देगा। यह सॉफ्टवेयर 2005 में शुरू की गई परियोजना का परिणाम है। यह सॉफ्टवेयर कई अन्य एप्लीकेशंस को चलाने में भी पूरी तरह सक्षम है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के कंप्यूटर साइंस विभाग में इस सॉफ्टवेयर का प्रदर्शन करते हुए कंप्यूटर वैज्ञानिक यान रेनार्ड और लॉरेंट बोनेट ने कहा कि ओपन वाइब सॉफ्टवेयर मस्तिष्क की गतिविधियों के साथ जुड़े विद्युत संकेतों को संसाधित करता है और इन्हें मशीन के लिए काम करने वाली कमांड में तब्दील कर देता है। उन्होंने कहा कि इसके जरिए व्यक्ति अपने कंप्यूटर या अन्य किसी स्वचालित प्रणाली के साथ बातें कर सकता है यानी बटन दबाने या रिमोट कंट्रोल के लिए हाथों के इस्तेमाल या अन्य किसी हरकत की जरूरत नहीं पड़ेगी। उन्होंने कहा कि ओपन वाइब ऐसा टूल है जो शोधकर्ताओं और चिकित्सकों से लेकर वीडियो गेम डेवलपर तक विभिन्न पेशे वाले लोगों के काम आ सकता है। यह पूछने पर कि क्या इसके जरिए सिर्फ सोचते हुए लिखा भी जा सकता है? उन्होंने कहा कि इसके लिए व्यक्ति को इइजी (इलेक्ट्रोएनसिफेलोग्राम) कैप पहननी होगी। इसके बाद वह अपना सारा ध्यान उस शब्द पर रखे जिसे वह बोलना चाहता है। जब यह शब्द दिमाग में कौंधेगा तो एक मस्तिष्क तरंग उत्पन्न होगी जिसे पकड़ कर मशीन द्वारा व्याख्या कर दी जाएगी। तकनीक शब्दों में विस्तार से बताते हुए वैज्ञानिकों ने कहा कि ओपन वाइब सॉफ्टवेयर लाइब्रेरी और माड्यूल्स की एक श्रृंखला है जिसे सी++ में लिखा गया है। प्रोग्रामर यूजर अपना खुद का कोड भी विकसित कर सकते हैं जबकि जो नॉन प्रोग्रामर ग्राफिकल इंटरफेस का इस्तेमाल कर सकते हैं। वैज्ञानिकों ने कहा कि यह सॉफ्टवेयर ऐसे लोगों के लिए बेहद फायदेमंद है जो पूरी तरह लकवाग्रस्त होते हैं।

Saturday, January 8, 2011

पारदर्शी सीमेंट से बनी दीवारें करेंगी कमरों को रोशन

इटली के वास्तुकारों ने एक ऐसे पारदर्शी सीमेंट का निर्माण किया है, जिससे निर्मित दीवारों से होकर सूर्य की किरणें आसानी से कमरे में आ सकेंगी। इसके इस्तेमाल से कमरे में ट्यूब लाइट को लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इस सीमेंट से बनी दीवारें शीशे की खिड़की की तरह नजर आएंगी। इटालसीमेंटी ग्रुप के वास्तुकारों द्वारा बनाए गए इस सीमेंट को आइ-लाइट नाम दिया गया है। यह दूर से सामान्य कंक्रीट जैसा ही दिखता है। वास्तुकारों ने इस सीमेंट का इस्तेमाल केवल एक बार शंघाई में पिछले वर्ष आयोजित प्रदर्शनी में किया था। इस सीमेंट से बिजली की बचत हो सकती है क्योंकि इसके प्रयोग से दिन में बल्ब से रोशनी की जरूरत नहीं होगी। पूर्व में भी ऑप्टिकल फाइबर केबल से इस प्रकार के सीमेंट बनाए जाने का प्रयास किया गया है। परंतु इटालसीमेंटीका दावा है कि यह उससे बेहतर है। इटालसीमेंटी ग्रुप के निदेशक बोरगारेलो का कहना है प्लास्टिक रेजीन से बनाया गया यह पारदर्शी सीमेंट आप्टिकल फाइबर केबल से बनाए गए सीमेंट की तुलना में बहुत सस्ता है। इसमें प्रकाश को पकड़ने की क्षमता भी अधिक है क्योंकि रेजीन में ऑप्टिकल फाइबर की तुलना में दृश्यता संबंधी भाग विस्तृत होता है।