Thursday, February 17, 2011

मंगल अभियान का पहला चरण पूरा


1969 में धड़का था पहला नकली दिल


देखने में यह भले यह वेलेंटाइन डे कार्ड पर बना दिल का कार्टून लगे। लेकिन असल में यह दुनिया का सबसे पहला और पुराना नकली दिल है जो 1969 में तीन दिन तक धड़का भी था। प्लास्टिक और पॉली फाइबर का बना यह दिल करीब आधा पाउंड का था। इसमें लगे ट्यूब बिस्तर के किनारे रखी एक वाशिंग मशीन के आकार की एक मशीन से जुड़े रहते थे। इस दिल के धड़कने और रक्त का सही दबाव बनाए रखने के लिए इसमें कई स्विच भी लगाए गए थे। इस पुरातन मशीन ने 1969 में अप्रैल के महीने में अमेरिका में हॉस्केल कार्प (47) नाम के मरीज को हृदय प्रत्यारोपण से ऐन पहले तीन दिन तक जिंदा भी रखा था। यानी यह प्लास्टिक का दिल जीवनदायी था। दुर्भाग्यवश यह हृदय प्रत्यारोपण सफल नहीं रहा था। कार्प ह्यूस्टन के सेंट ल्यूक अस्पताल में नया मानव हृदय लगने के लिए दो दिन बाद ही मर गए थे। लेकिन इसके बाद अब से करीब 42 साल पहले सारी दुनिया में यह स्पष्ट हो गया था कि एक कृतिम हृदय भी जीवन दे सकता है। हालांकि उस समय चिकित्सा समुदाय के बहुत से लोगों ने इस ऑपरेशन को अनैतिक करार दिया था। कलाकृतियां संग्रह करने वाले स्मिथसोनियन संस्थान ने पहले प्लास्टिक हृदय का फोटो जारी कर सबको अचंभित कर दिया है। यह फोटो 14 फरवरी को अमेरिकन हार्ट मंथ के अवसर पर जारी किया गया। उस समय चिकित्सा समुदाय की मंजूरी के बगैर यह आपरेशन करने वाले उस समय के सबसे बड़े सर्जन के नाम थे डॉ. माइकल डेबेके और डॉ. कूली।

Monday, February 14, 2011

नासा ने इसरो से कहा, चंद्र अभियान में बनें साझीदार


अमेरिका ने इसरो से प्रतिबंध हटाने के बाद अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की एक शीर्ष प्रयोगशाला ने भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी को एक ऐसे चंद्र अभियान में साझीदार बनने का प्रस्ताव दिया है जिसका मकसद चांद की सतह से एक किलोग्राम चट्टान लाना है। मंगल एवं शुक्र ग्रहों पर अभियान भेजने वाले जेट प्रॉपल्शन लैबोरेट्री (जेपीएल) की च्च्छा है कि इसरो चांद के निकट एक उपग्रह स्थापित करे जो इसके ल्यूनर लैंडर प्रोब और धरती के बीच तार का काम करेगा। इसरो अध्यक्ष के राधाकृष्ण ने कहा यह मिशन चंद्रयान-एक मिशन के समान ही होगा। जेपीएल ने इसरो से चांद के पास एक उपग्रह स्थापित करने को कहा है। अंतरिक्ष संबंधी मामलों की नीति बनाने वाली सर्वोच्च इकाई अंतरिक्ष आयोग ने जेपीएल के साथ साझेदारी के लिए हरी झंडी दिखा दी है। जेपीएल और इसरो जिस परियोजना के लिए मिलकर काम करेंगे उसका नाम मून राइज होगा। मून राइज परियोजना नासा द्वारा 2009 में घोषित न्यू फ्रंटियर्स प्रोग्राम के तहत शुरू की जा सकती है। परियोजना के हिस्से के तौर पर जेपीएल चंद्रमा के दक्षिणी धु्रव पर एक बेसिन में रोबोटिक लैंडर गिराने की योजना बना रहा है ताकि अध्ययन के लिए चांद पर मौजूद चट्टानों को धरती पर भेजा जा सके। मिशन 2016 में शुरू किया जा सकता है। 400-500 किलोग्राम के उपग्रह का जीवन पांच साल तक हो, इसकी योजना बनाई जा रही है और यह इसरो के कुछ वैज्ञानिक प्रयोगों को भी ले जाने में सक्षम हो। यह प्रस्ताव अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत दौरे के दौरान की गई उस घोषणा का परिणाम है जिसमें उन्होंने भारत-अमेरिकी सहयोग की बात कही थी।


Thursday, February 10, 2011

दिमाग को बुढ़ापे से बचाने पर काम शुरू


मस्तिष्क एक-दूसरे से गहराई से जुड़े एक छोटे से वि नेटवर्क के रूप में है न कि अलग-अलग क्षेत्रों के संग्रह के रूप में
वाशिंगटन (एजेंसी)। वैज्ञानिकों की एक टीम ने पाया है कि मानव मस्तिष्क के काम करने की गति को सही बनाये रखने के लिए संयोजन प्रक्रि या काफी अहम है और बुढ़ापे के साथ इस प्रक्रि या में गिरावट आने लगती है। इस खोज के साथ ही बुढ़ापे में मस्तिष्क में होने वाले इस क्षय के उपचार की उम्मीदें बढ़ गई हैं। न्यू साउथ वेल्स के भारतीय मूल के वैज्ञानिक परमिंदर सचदेव और उनके सहकर्मियों ने पाया कि मस्तिष्क एक-दूसरे से गहराई से जुड़े एक छोटे से वि नेटवर्क के रूप में है न कि अलग-अलग क्षेत्रों के संग्रह के रूप में, जैसा कि पहले माना जाता था। पत्रिका न्यूरो साइंसने खबर दी है कि वैज्ञानिकों ने अपने अनुसंधान में मानव मस्तिष्क के नाड़ी तंत्र का नक्शा लिया और इससे होने वाले सूचना संचार तथा भाषा जैसे विशिष्ट कायरे को परिभाषित किया। वे अब इस बात का पता लगा रहे हैं कि कौन से कारक इन तंत्रों की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। वैज्ञानिक इस उम्मीद के साथ ऐसा कर रहे हैं कि इससे बढ़ती आयु में होने वाले क्षरण को रोका जा सकेगा। ऐसे में माना जा रहा है कि आने वाले समय में इस क्षरण को रोक कर बुढ़ापे में मानसिक स्थिति को काबू किया जा सकेगा। प्रोफेसर सचदेव ने कहा कि मस्तिष्क के खास हिस्से विशेष कायरे के लिए महत्वपूर्ण हैं लेकिन साथ ही मस्तिष्क के विभिन्न हिस्सों में आपसी और एक हिस्से से दूसरे हिस्से के बीच सूचना का संचार भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। हम सब जानते हैं कि जब सड़क या फोन नेटवर्क अवरुद्ध हो जाता है तो क्या होता है। बिल्कुल ऐसा ही मस्तिष्क के मामले में होता है। उन्होंने कहा कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ मस्तिष्क के नेटवर्क की क्षमता में गिरावट आने लगती है। इससे मस्तिष्क में सूचना संचार की गति धीमी पड़ जाती है जो अन्य संज्ञानात्मक पण्राली को प्रभावित कर सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि नई एमआरआई प्रौद्योगिकी के आगमन और आकलन क्षमता ने तंत्रिका समूह के बेहतर नक्शे लेने में मदद की है। इसके फलस्वरूप वैज्ञानिक दिमाग का अध्ययन सही ढंग से कर सकते हैं। सचदेव ने कहा कि पहले मस्तिष्क का अध्ययन करते समय विशेष क्षेत्रों में पाए जाने वाले स्लेटी हिस्से पर ध्यान केंद्रित किया जाता था क्योंकि अध्ययन करने वालोें का मानना था कि यह वह हिस्सा है जहां गतिविधि होती है। सफेद हिस्से पर ध्यान नहीं दिया जाता था। लेकिन यह वह पदार्थ है जो मस्तिष्क के एक क्षेत्र को दूसरे से जोड़ता है और इस जुड़ाव के बिना स्लेटी पदार्थ बेकार है। वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में 342 स्वस्थ लोगों का एमआरआई किया जिनकी उम्र 72 से 92 साल के बीच थी। इसके लिए उन्होंने नक्शे लेने की नई तकनीक डिफ्यूजन टेंसर इमेजिंग’ (डीटीआई) का इस्तेमाल किया।


वैज्ञानिक शोधों के लिए हो अनुकूल माहौल


विज्ञान संबंधी शोध के क्षेत्र में अग्रणी होने के बावजूद भारत अंतरराष्ट्रीय मान्यता या श्रेय पाने में पिछड़ क्यों जाता है। यह विचारणीय मुद्दा है। पिछले वर्ष टेस्ट ट्यूब बेबी की सफलता में मेडिसिन का नोबल पुरस्कार 32 वर्ष बाद डॉ. राबर्ट जी एडर्वड और पेट्रिक स्टेपटो को दिया गया। जुलाई 1978 में इनके प्रयासों से आईवीएफ लुईस दुनिया में आई थी। भारतीय डॉक्टर सुभाष मुखोपाध्याय ने लुईस के जन्म के तीन महीने बाद ही दुनिया की दूसरी टेस्ट ट्यूब बेबी दुर्गा को जन्म दिलवाया पर दुर्भाग्य से उनके कार्य की प्रशंसा के बजाय तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा उनके अनुसंधान को प्रकाशित होने से न सिर्फ रोका गया बल्कि तंग होकर 1981 में वह आत्महत्या करने पर मजबूर हो गये। आखिर में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने 2005 में उनके काम को मान्यता दी। पर यह सब इतनी देर से हुआ कि डॉ. मुखोपाध्याय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के सम्मान को भी ठेस लगी। इसी तरह मार्कोनी को टेलीग्राफ की खोज के लिए दुनिया ने सराहा, जबकि कहा जाता है कि जगदीशचंद्र बसु इस पर पहले ही अनुसंधान कर चुके थे। माना कि गुलामी के दौर में भारतीयों के शोधों को अंग्रेज महत्व नहीं देते थे लेकिन दुर्भाग्य से आजादी के बाद भी अनेक वैज्ञानिक उपलब्धियों को वरीयता नहीं दी जाती। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कई कनिष्ठ वैज्ञानिकों की आत्महत्या की खबरें जब-तब आती रही हैं। आरोप लगते रहे हैं कि उनकी उपलब्धि का श्रेय उनके वरिष्ठ स्वयं लेने की कोशिश करते हैं। हमारे शोध संस्थानों में ऐसी स्थितियां अब भी बनी हुई हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में नये-नये अनुसंधान होने चाहिए लेकिन अव्यवस्था और नौकरशाही के दबाव में यह संस्थान कुछ भी करने में अपने को उतना सक्षम नहीं पा रहा है। कुछ वर्षों पहले एक विश्वसनीय सूत्र ने बताया था कि संस्थान में अत्याधुनिक मशीनें चलाने वाले ही नहीं थे। ऐसे अनेक चिकित्सक जो अब संस्थान छोड़ चुके हैं और निजी चिकित्सा संस्थानों में अपनी सेवायें देने के साथ सफल शोध कर रहे हैं इसका खुलासा करते हैं। इनमें एक डॉ. जीसी तलवार जो नेशनल इंस्टीट्यूट आफ इम्यूनोलॉजी के संस्थापक हैं का दावा है कि विगत में उन्होंने दो टीकों की खोज की थी पर उनके विभागाध्यक्ष ने उस शोध को रोकने की पूरी कोशिश की। डा. तलवार याद करते हैं कि 1956 में जब एआईआईएमएस खुला था तो उनकी नियुक्ति ऐसोसिएट प्रोफेसर के रूप में हुई थी। बाद में जब प्रोफेसर के पद सृजित हुए तो डॉ. तलवार सहित संस्थान के 22 लोगों को कोई वरीयता नहीं दी गई और बाहरी लोगों को नियुक्त किया गया। वह मानते हैं जब तक किसी संस्थान में कोई गाड फादर न हो, तब तक शोधार्थी सही ढंग से शोध नहीं कर सकता। 1970 में जब वह कुष्ठ रोग के टीके का क्लिनिकल ट्रायल कर रहे थे तब भी उन्हें भारी अवरोधों का सामना करना पड़ा था और इससे वह कार्य तीन वर्ष पीछे हो गया। डॉ. तलवार ने जनसंख्या नियंतण्रके टीके का ईजाद किया तो उस पर भी विवाद हुआ। कहा गया कि एंटी एचसीजी टीका महिलाओं को बांझ बना देता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जब डॉ. तलवार के शोधपत्र पर जनसंख्या परिषद के निदेशक डॉ शेल्डन का ध्यान गया तो भारत सरकार के तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. कर्ण सिंह को इसकी जानकारी दी गई। बाधाओं के बावजूद 1980 में इस टीके का पेटेंटीकरण हुआ। तलवार को कनाडा और राकफेलर संस्थान से आर्थिक सहायता मिली। यह भी आरोप है कि अक्सर शोध पर वरिष्ठ सदस्य अपना नाम पहले रखवाने का दबाव डालते हैं। जबकि शोध पत्र कनिष्ठ सहयोगी द्वारा तैयार किया गया होता है। जबकि विदेशों के मेडिकल जनरल में शोध पत्र तैयार करने वाले का नाम पहले और निरीक्षक का बाद में छपता है। भारत में यह प्रक्रिया एकदम उल्टी है। डा. अनूप मिश्रा जो अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के मेडिसिन विभाग में 30 वर्षों तक प्रोफेसर रहे, का भी आरोप है कि उनके कनिष्ठ सहयोगियों को एचआईवी पर शोध करने की अनुमति नहीं दी गई। यहां तक कि रोगी के रजिस्ट्रेशन, उसका नाम, पता और फोन नंबर आदि विभागाध्यक्ष किसी को नहीं बताते। यानी अफसरशाही शोध कायरें में बाधा पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ती। उनका अनुभव है कि अनुसंधान में काम आने वाले छोटे से छोटे उपकरण के लिए कई चैनलों से हो कर गुजरना पड़ता है। जबकि निजी संस्थानों में जैसे ही एथिक्स पैनल शोध पत्र को स्वीकृति देता है, एक महीने के भीतर शोध कार्य शुरू हो जाता है। वैज्ञानिक प्रगति के निमित्त आज हमें इन कमियों को दूर करने की आवश्यकता है, तभी ब्रेन ड्रेन को रोक सकते हैं। जरूरी नहीं कि यह ब्रेन देश से बाहर जाए। क्योंकि आज के समय में उसकी प्रतिभा का उपयोग कोई भी देश कहीं भी बैठ कर अपने हित में कर सकता है। वैज्ञानिकों के लिए शोध का अनुकूल माहौल होना चाहिए। नहीं तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां देश के अनुसंधानों का पेटेंट अपने नाम करवाती जाएंगी। और हमें इनका कोई श्रेय नहीं मिल पाएगा।


Wednesday, February 9, 2011

वैज्ञानिकों ने खोजा आठवां आश्चर्य


: वैज्ञानिकों ने न्यूजीलैंड में करीब 100 साल से मिट्टी में दबी गुलाबी और सफेद रंग की सीढ़ीनुमा आकृतियों के अवशेषों को खोज निकाला है। उनका दावा है कि यह आकृतियां दुनिया का आठवां आश्चर्य हैं। दरअसल यह पिंक टैरेस एक सदी पहले ज्वालामुखी के नीचे दब गया था जो बरसों बाद मिला है। उत्तरी आईलैंड में रोटोमहाना झील के किनारे बनी यह गुलाबी और सफेद रंग की आकृतियां 19 वीं सदी के आखिर तक दुनिया भर के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र थीं। वे जियोथर्मल प्रणाली की वजह से बनी कुदरत की इस खूबसूरत रचना को दिलचस्पी से देखते थे। इसी बीच 10 जून 1886 को माउंट टैरवेरा ज्वालामुखी में विस्फोट हुआ और उसके लावे के आगोश में यह आकृतियां भी आ गईं तथा तलछट में दब गईं। झील का विस्तार हो गया और वह हिस्सा इसके दायरे में आ गया जहां गुलाबी और सफेद टैरेस थे। एक सदी से भी अधिक समय तक लोग यह अटकलें लगाते रहे कि क्या सीढ़ीनुमा खूबसूरत आकृतियों का कोई हिस्सा ज्वालामुखी के कहर में बच पाया। अब एक अंतरराष्ट्रीय दल ने अत्याधुनिक तकनीक की मदद से रोटोमहाना झील की सतह नापी और उसी दौरान वहां गुलाबी टैरेस के बड़े हिस्सों का पता चला। दल के प्रमुख और न्यूजीलैंड के जीएनएस साइंस के कॉर्नेल डे रोन्डे ने बताया कि वैज्ञानिक इस उपलब्धि से उत्साहित हैं। उन्होंने कहा कि शुरू में हमें टैरेस होने के संकेत मिले तो हमने दोबारा पूरा इलाका देखा। हमें 95 फीसदी भरोसा है कि सतह पर हमने गुलाबी टैरेस देखा। वैज्ञानिकों का कहना है कि एकत्र किए गए आंकड़ों में पानी में अ‌र्द्धचंद्राकार टैरेस जैसी रचनाएं उस स्थान पर साफ नजर आ रही हैं जहां 1886 से पहले गुलाबी और सफेद सीढ़ीनुमा रचनाएं थीं। ए रचनाएं भूरे रंग की तलछट से ढकी हैं। इन रचनाओं का पता लगाने के बाद, वैज्ञानिकों ने पानी के अंदर प्रयुक्त किए जाने वाले कैमरे से झील की सतह की तस्वीरें लीं जहां से इस टैरेस के अवशेष की झलक दिखाई दे रही है। डॉ. डे रोन्डे ने बताया कि शेष सीढ़ीनुमा रचनाएं या तो ज्वालामुखी में विस्फोट के दौरान नष्ट हो गईं या अब भी मोटी तलछट के नीचे दबी हैं। बहरहाल, वैज्ञानिकों को उस स्थान पर विशाल सफेद सीढ़ीनुमा रचना के कोई चिह्न नहीं मिले, जहां 1886 से पहले यह थीं। दोनों टैरेस ज्वालामुखी में विस्फोट से पहले ही अलग अलग हो चुके थे।

Monday, February 7, 2011

सूर्य की अति सक्रियता की आशंका से एरीज के वैज्ञानिक भी चिंतित


सावधान! 2012 में सूर्य बरपा सकता है कहर
माया सभ्यता के कलेंडर के आधार पर 2012 में पृथ्वी पर मानव जीवन की समाप्ति का दावा करने वाले दार्शनिकों की भविष्यवाणी क्या सही साबित होने जा रही है? हालांकि अभी तक इस बात का कोई वैज्ञानिक क्लू तो सामने नहीं आया है लेकिन सूर्य की गतिविधियों के अपेक्षाओं के अनुरूप घटित न होने से विश्वभर के वैज्ञानिक इस बात को लेकर जरूर चिंतित हैं कि 2012 में सूर्य की अति सक्रियता पृथ्वी पर जीवन को नष्ट नहीं तो प्रभावित अवश्य कर सकती है।
विश्व के वैज्ञानिकों के साथ ही नैनीताल के आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान एवं शोध संस्थान (एरीज) के वैज्ञानिक भी सूर्य की गतिविधियों पर नजर रखे हुए हैं। उनका निष्कर्ष है कि बीते दो वर्षों से सूर्य में अपेक्षित सक्रियता नहीं है लेकिन 2012 में सूर्य में सक्रिया बहुत अधिक बढ़ सकती है जो पृथ्वी के बाहरी वातावरण (आयोनोस्फेयर) में सौर्य वातावरण (सोलर वैदर) को प्रभावित कर सकती है। सूर्य की गतिविधियों पर सतत नजर रखे वैज्ञानिक डा. अभिषेक श्रीवास्तव ने इस संबंध में बताया कि सूर्य की चौबीसवीं सोलर साइकिल लगभग तीन साल पहले प्रारंभ हुई थी। एक साइकिल ग्यारह वर्ष की होती है। इस दौरान सूर्य पर सोलर फ्लेयर सन स्पॉट आदि गतिविधियों में उतार चढ़ाव होते रहता है। इससे पृथ्वी का वातावरण संतुलित रहता है लेकिन बीते दो वर्षों से सूर्य पर गतिविधियां बहुत ही न्यूनतम हैं तथा फ्लेयर्स और सन स्पॉट अपेक्षा से बहुत कम हैं। डा.श्रीवास्तव ने बताया कि गतिविधियों के कम होने से वैज्ञानिकों को आशंका है कि 2012 में यह गतिविधियां एकाएक बहुत बढ़कर चरम पर पहुंच सकती हैं। इससे सूर्य से होने वाला सीएमई भी बहुत बढ़ सकता है। उन्होंने बताया कि इससे पृथ्वी पर किसी नुकसान की कोई संभावनाएं अभी तक नजर नहीं आती, लेकिन आयोनोस्फेयर प्रभावित होने से सैटेलाइट्स पर इसका आंशिक प्रभाव पड़ सकता है। एरीज के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा.वहाबुद्दीन ने बताया कि मानव निर्मित सभी सैटेलाइट्स अयोनोस्फेयर में ही स्थित हैं। यदि आशंका के अनुरूप 2012 में सोलर गतिविधि बढ़ी तो वह उनपर प्रभाव पड़ सकता है। इसका असर विशेषकर दूरसंचार तथा अन्य सुविधाओं पर पड़ सकता है। हवाई सेवाएं तथा सैटेलाइट्स से संचालित होने वाली अन्य सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार यदि ऐसी स्थिति आए तो इसे पहले ही नियंत्रित कर सकने के उपाय भी फिलहाल उपलब्ध नहीं हैं जो कि वैज्ञानिकों की चिंताओं को और बढ़ा रहा है।